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यूएई का ओपेक और ओपेक+ से बाहर निकलना: वैश्विक ऊर्जा राजनीति में बड़ा बदलाव

  • वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था में एक बड़ा और असामान्य घटनाक्रम सामने आया है, जब संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने ओपेक (OPEC) और ओपेक+ (OPEC+) से औपचारिक रूप से बाहर निकलने की घोषणा कर दी।
  • यह निर्णय न केवल तेल बाजारों को प्रभावित कर रहा है, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक संतुलन को भी बदलने की क्षमता रखता है।

पृष्ठभूमि:-

  • यह फैसला 28 अप्रैल 2026 को लिया गया। यह उस समय आया जब वैश्विक तेल बाजार पहले से ही तनाव में थे ,और ईरान के साथ चल रहे संघर्ष ने ऊर्जा आपूर्ति को अस्थिर कर रखा है ।
  • कई देशों में कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ गया था।

यूएई के बाहर निकलने के प्रमुख कारण

(i) सुरक्षा असंतोष और सैन्य समर्थन की कमी

  • यूएई ने आरोप लगाया कि अन्य अरब देश उसके खिलाफ ईरानी हमलों के समय पर्याप्त समर्थन नहीं दे सके।
  • खाड़ी क्षेत्र में सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ी।
  • रक्षा सहयोग केवल कागज़ी स्तर तक सीमित रहा, वास्तविक कार्रवाई नहीं हुई।

 (ii) क्षेत्रीय संगठनों से निराशा

  • खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) की भूमिका को यूएई ने कमजोर बताया।
  • अरब लीग की प्रतिक्रिया को भी प्रभावहीन माना गया।
  • यूएई का मानना है कि संकट के समय इन संगठनों ने निर्णायक नेतृत्व नहीं दिखाया। 

(iii) होर्मुज जलडमरूमध्य संकट

  • होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है।
  • यहां से वैश्विक कच्चे तेल और LNG का लगभग 20% गुजरता है।
  • ईरान द्वारा जहाजों पर हमले और धमकियों ने इस मार्ग को अत्यंत संवेदनशील बना दिया है।
  • इससे यूएई सहित पूरे खाड़ी क्षेत्र का तेल व्यापार प्रभावित हुआ है।

(iv) रणनीतिक स्वतंत्रता की नीति

  • यूएई अब अपने ऊर्जा उत्पादन और निर्यात नीति पर अधिक स्वतंत्र नियंत्रण चाहता है।
  • ओपेक के उत्पादन कोटा सिस्टम से बाहर निकलकर वह लचीलापन बढ़ाना चाहता है।
  • वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी भूमिका निभाने की रणनीति अपनाई जा रही है।

ओपेक और ओपेक+ पर प्रभाव

  • यूएई लंबे समय से ओपेक का महत्वपूर्ण सदस्य रहा है ,उसके बाहर निकलने से संगठन की एकता कमजोर हो सकती है।
  • सऊदी अरब की नेतृत्व भूमिका पर दबाव बढ़ेगा।
  • उत्पादन कोटा तय करने में आंतरिक मतभेद और गहरे हो सकते हैं और ओपेक+ की सामूहिक निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

वैश्विक ऊर्जा बाजार पर प्रभाव

  1.  तेल कीमतों में अस्थिरता :-कच्चे तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव संभव है ,निवेशकों में अनिश्चितता बढ़ सकती है।
  2.  आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव :-वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ेगा। यूरोप और एशिया के आयातक देश अधिक प्रभावित हो सकते हैं।
  3.  नए ऊर्जा गठबंधनों की संभावना :-गैर-ओपेक देशों के साथ नए ऊर्जा समझौते बन सकते हैं ,वैश्विक ऊर्जा राजनीति अधिक बहुध्रुवीय (multipolar) हो सकती है।

अमेरिका और पश्चिमी देशों की भूमिका

  • डोनाल्ड ट्रम्प ने पहले ओपेक पर तेल कीमतें बढ़ाने का आरोप लगाया था ,यूएई का यह कदम अमेरिका की रणनीतिक सोच के लिए अनुकूल माना जा रहा है।
  • इससे खाड़ी देशों और अमेरिका के बीच ऊर्जा-राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।
  • अमेरिका को मध्य पूर्व में ऊर्जा सुरक्षा रणनीति को पुनः परिभाषित करना पड़ सकता है।

मध्य पूर्व की भू-राजनीति पर प्रभाव

  • खाड़ी देशों में एकता की कमी और स्पष्ट हो सकती है ,ईरान-खाड़ी तनाव और बढ़ने की संभावना है।
  • क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे पर पुनर्विचार आवश्यक हो सकता है।
  • सैन्य गठबंधनों और रक्षा समझौतों में बदलाव संभव है।

OPEC (ओपेक) और OPEC+

OPEC (ओपेक) और OPEC+ दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल उत्पादक संगठन हैं। इनका मुख्य काम दुनिया भर में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों और उसकी सप्लाई को कंट्रोल करना है।

पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन (OPEC) क्या है ?

  • OPEC का पूरा नाम Organization of the Petroleum Exporting Countries (पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन) है।
  • इसकी स्थापना सितंबर 1960 में बगदाद(इराक) सम्मेलन में हुई थी।, ओपेक की स्थापना मूल रूप से पांच संस्थापक सदस्यों ईरान, कुवैत, इराक, सऊदी अरब और वेनेजुएला द्वारा की गई थी।
  • यह पश्चिमी बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियों ("सेवन सिस्टर्स") के प्रभुत्व के जवाब में बनाया गया , जो की पहले कीमतों को नियंत्रित करती थीं।
  • संयुक्त अरब अमीरात(UAE) औपचारिक रूप से 1967 में  OPEC (ओपेक)  में शामिल हुआ,
  • मुख्यालय : इसका हेडक्वार्टर वियना, ऑस्ट्रिया में है।
  • उद्देश्य : सदस्य देशों की तेल नीतियों को एक समान बनाना ताकि तेल की कीमतें स्थिर रहें और उत्पादक देशों को सही मुनाफा मिल सके।
  • सऊदी अरब इस ग्रुप का सबसे शक्तिशाली देश माना जाता है।
  • वर्तमान सदस्य देश (12 देश):- संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ –साथ  अल्जीरिया, कांगो,इक्वेटोरियल, गिनी, गैबॉन, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, सऊदी अरब, वेनेजुएला । 

OPEC+ क्या है ?

  • OPEC+ कोई अलग संगठन नहीं है, बल्कि यह OPEC और 10 अन्य गैर-OPEC तेल उत्पादक देशों का एक गठबंधन है।
  • गठन: इसका गठन 2016 में हुआ था जब तेल की कीमतें बहुत गिर गई थीं।
  • उद्देश्य: इसमें रूस जैसे बड़े तेल उत्पादकों को शामिल किया गया ताकि वैश्विक तेल बाजार पर और अधिक नियंत्रण पाया जा सके।
  • रूस (Russia) इस समूह का सबसे महत्वपूर्ण गैर-OPEC सदस्य है।

OPEC+ के 10 अतिरिक्त देश:

  • रूस, कजाकिस्तान, अजरबैजान, बहरीन, ब्रुनेई, मलेशिया, मैक्सिको, ओमान, दक्षिण सूडान और सूडान।
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