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थोरियम आधारित ऊर्जा आत्मनिर्भरता

संदर्भ:

भारत के पास सीमित यूरेनियम है लेकिन विशाल थोरियम संसाधन हैं। थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा में तेजी लाकर देश अपनी ऊर्जा स्वतंत्रता सुनिश्चित कर सकता है।

भारत की परमाणु ऊर्जा रणनीति

यह तीन चरणों पर आधारित है, जो देश के सीमित यूरेनियम संसाधनों और विशाल थोरियम भंडार को ध्यान में रखकर बनाई गई थी:

  1. पहला चरण:
    • Pressurised Heavy Water Reactors (PHWRs) यूरेनियम पर चलेंगे।
    • इन रिएक्टरों का मुख्य उद्देश्य बिजली उत्पादन के साथ प्लूटोनियम भी बनाना है।
    • यह प्लूटोनियम अगले चरण के लिए ईंधन का स्रोत बनेगा।
  2. दूसरा चरण:
    • प्लूटोनियम का उपयोग फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों में किया जाएगा।
    • इन रिएक्टरों में ईंधन को "ब्रीड" किया जाता है, यानी ईंधन से अधिक विखंडनीय (Fissile) ईंधन उत्पन्न होता है।
    • इसका उद्देश्य थोरियम आधारित चरण के लिए पर्याप्त विखंडनीय ईंधन (यूरेनियम-233) तैयार करना है।
  3. तीसरा चरण (दीर्घकालिक):
    • थोरियम को यूरेनियम-233 में परिवर्तित करके थोरियम आधारित रिएक्टरों के लिए ईंधन बनाया जाएगा।
    • यह भारत के लिए लंबी अवधि की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

थोरियम-आधारित ऊर्जा की ओर तेजी

अब भारत के पास अंतर्राष्ट्रीय बाजार से यूरेनियम उपलब्ध है, जिससे PHWR क्षमता का विस्तार संभव हो गया है। इसके लाभ:

  • थोरियम-यूरेनियम-233 उत्पादन में तेजी: PHWR में थोरियम को HALEU (High-Assay Low-Enriched Uranium) जैसे उन्नत ईंधन के साथ विकिरणित किया जा सकता है।
  • ऊर्जा स्वतंत्रता में योगदान: विखंडनीय U233 का पर्याप्त भंडार तैयार होने पर थोरियम आधारित रिएक्टरों की ओर संक्रमण तेज होगा।
  • फायदे:
    • आर्थिक: थोरियम ईंधन स्थानीय स्रोत है, इसलिए लागत कम हो सकती है।
    • सुरक्षा: विखंडनीय ईंधन का उत्पादन नियंत्रित तरीके से होता है।
    • पर्यावरणीय: थोरियम चक्र कम रेडियोधर्मी अपशिष्ट उत्पन्न करता है।
  • इस दृष्टिकोण से PHWR क्षमता का विस्तार थोरियम पर आधारित तीसरे चरण में तेज संक्रमण का अवसर प्रदान करता है।

PHWR क्षमता विस्तार

भारत का लक्ष्य 2047 तक 50-75 GWe (गीगावाट इलेक्ट्रिक) PHWR क्षमता प्राप्त करना है। इसके लिए:

  • वार्षिक वृद्धि दर: लगभग 3 GWe प्रति वर्ष जोड़नी होगी। इसका मतलब है 700 MWe और 220 MWe रिएक्टरों के अनुसार सालाना 5-8 नए रिएक्टर।
  • वित्तीय संसाधन: यह एक विशाल निवेश है, इसलिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन की आवश्यकता है।
  • नई कंपनियों और संस्थाओं की भूमिका:
    • NPCIL (Nuclear Power Corporation of India Limited) टेक्नोलॉजी प्रदाता और मेंटर के रूप में कार्य करेगा।
    • अन्य सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के खिलाड़ी निर्माण और संचालन में सहयोग करेंगे। 

प्रेसराइज़्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWR)  

  • प्रेसराइज़्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWR) एक महत्वपूर्ण परमाणु ऊर्जा रिएक्टर तकनीक है, जिसमें भारी जल (DO) का उपयोग न्यूट्रॉन मंदक (Moderator) तथा शीतलक (Coolant) दोनों के रूप में किया जाता है। 
  • यह तकनीक विशेष रूप से उन देशों के लिए उपयुक्त मानी जाती है, जहाँ उच्च-संवर्धित यूरेनियम की उपलब्धता सीमित है।

कार्यप्रणाली  

  • PHWR में प्राकृतिक या कम-संवर्धित यूरेनियम ईंधन के नाभिकीय विखंडन से ऊर्जा उत्पन्न होती है।
  • भारी जल न्यूट्रॉनों की गति को नियंत्रित कर विखंडन की श्रृंखला प्रतिक्रिया को बनाए रखता है। 
  • उत्पन्न ऊष्मा का उपयोग भाप बनाकर टर्बाइन चलाने और बिजली उत्पादन के लिए किया जाता है।

भारत के परमाणु कार्यक्रम में भूमिका

  • PHWR भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की रीढ़ हैं। ये भारत की तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा योजना के प्रथम चरण का आधार हैं। 
  • इनके माध्यम से न केवल बिजली उत्पादन होता है, बल्कि प्लूटोनियम-239 का उत्पादन भी किया जाता है, जो दूसरे चरण के फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों के लिए आवश्यक है।
  • PHWR में थोरियम को न्यूट्रॉनों से विकिरणित कर यूरेनियम-233 (U-233) का उत्पादन किया जा सकता है। यह भारत के विशाल थोरियम भंडार के उपयोग और दीर्घकालिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

निष्कर्ष  

PHWR क्षमता का विस्तार भारत को थोरियम-आधारित परमाणु ऊर्जा की ओर तेज़ी से बढ़ने का अवसर देता है। 50–75 GWe लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन और नए सार्वजनिक-निजी भागीदार आवश्यक हैं। दीर्घकालिक रणनीति भविष्य की उन्नत तकनीकों और थोरियम ईंधन चक्र पर केंद्रित रहनी चाहिए।

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