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केंद्रीय बजट 2026 और शहरी भारत

संदर्भ 

केंद्रीय बजट 2026 में शहरी विकास के लिए किए गए केंद्रीय आवंटन में 11.6% की कटौती ने भारत के शहरों के प्रति सरकार की प्राथमिकताओं व प्रतिबद्धता को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। 

भारत में शहरी विकास: पृष्ठभूमि एवं महत्व 

  • शहरी क्षेत्र भारत के आर्थिक और सामाजिक बदलाव की धुरी माने जाते हैं। देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग दो-तिहाई हिस्सा शहरों से आता है और यही क्षेत्र रोजगार सृजन, नवाचार तथा सेवा वितरण के प्रमुख केंद्र हैं। इसके बावजूद तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण ने आवास, परिवहन, स्वच्छता, जलापूर्ति और शहरी प्रशासन पर भारी दबाव डाला है। 
  • इन चुनौतियों से निपटने के लिए निरंतर और पर्याप्त सार्वजनिक निवेश की आवश्यकता होती है, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि शहरी स्थानीय निकाय (ULB) आर्थिक रूप से कमजोर हैं और केंद्र व राज्य सरकारों से मिलने वाले अनुदानों पर काफी हद तक निर्भर रहते हैं। 
  • संविधान के 74वें संशोधन के माध्यम से नगरपालिकाओं को कार्यात्मक स्वायत्तता देने की परिकल्पना की गई थी किंतु व्यवहार में धन, कार्य एवं कर्मचारियों का अधूरा हस्तांतरण उनकी प्रभावशीलता को सीमित करता रहा है।
  • इसी पृष्ठभूमि में पीएमएवाई-शहरी, अमृत और स्वच्छ भारत मिशन-शहरी जैसी केंद्रीय योजनाएँ शुरू की गई थीं, ताकि शहरी सेवाओं का एक न्यूनतम मानक सुनिश्चित किया जा सके और सार्वजनिक परिवहन में निवेश के ज़रिये इस कमी को पूरा किया जा सके। 

शहरी विकास का वित्तीय ढांचा 

  • भारत में शहरी विकास का वित्तपोषण कई स्रोतों से होता है, जैसे- केंद्रीय आवंटन, राज्य बजट, नगरपालिका आय और उधार। केंद्र प्रायोजित योजनाएँ (CSS) विशेष रूप से आवास, स्वच्छता, जलापूर्ति व परिवहन जैसे क्षेत्रों में अहम भूमिका निभाती हैं।
  • जहाँ मेट्रो रेल जैसी पूंजी-प्रधान परियोजनाओं को निरंतर समर्थन मिलता रहा है, वहीं रोज़मर्रा की शहरी सेवाएँ, जैसे- कचरा प्रबंधन, बस सेवाएँ, फुटपाथ, जल निकासी और अनौपचारिक आवास स्थिर व अनुमानित वित्तीय सहायता पर निर्भर करती हैं।
  • हाल के वर्षों में लू, बाढ़ और जल संकट जैसी जलवायु-जनित चुनौतियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि लचीले शहरी बुनियादी ढांचे में निवेश अब केवल सामाजिक कल्याण का विषय नहीं है बल्कि व्यापक आर्थिक आवश्यकता बन चुका है। 

केंद्रीय बजट 2026: शहरी क्षेत्रों के लिए आवंटन 

  • केंद्रीय बजट 2026 में शहरी विकास के लिए कुल केंद्रीय व्यय को 96,777 करोड़ रुपए से घटाकर 85,522 करोड़ रुपए कर दिया गया है, जो नाममात्र रूप से 11.6% की कमी को दर्शाता है।
  • मुद्रास्फीति को ध्यान में रखा जाए, तो वास्तविक शहरी व्यय में गिरावट इससे कहीं अधिक गंभीर दिखाई देती है। 
  • यह कटौती ऐसे समय में की गई है जब शहर बड़े पैमाने पर प्रवासन को समाहित कर रहे हैं, जर्जर बुनियादी ढांचे से जूझ रहे हैं और जलवायु संबंधी दबावों का सामना कर रहे हैं। 
  • यह रुझान राजकोषीय प्राथमिकताओं में बदलाव की ओर संकेत करता है, जहाँ शहरी विकास को आर्थिक प्रगति के एक महत्वपूर्ण निवेश क्षेत्र के बजाय द्वितीयक या अवशिष्ट क्षेत्र की तरह देखा जा रहा है। 

शहरी व्यय में असंतुलित प्राथमिकताएँ 

  • कुल बजट में कमी के बावजूद मेट्रो रेल परियोजनाओं पर खर्च का वर्चस्व बना हुआ है। वर्ष 2026–27 में मेट्रो और मास रैपिड ट्रांजिट सिस्टम के लिए 28,740 करोड़ रुपए निर्धारित किए गए हैं जो कुल शहरी आवंटन का लगभग एक-तिहाई है। यद्यपि बड़े महानगरों के लिए मेट्रो नेटवर्क उपयोगी हैं किंतु ये अत्यधिक पूंजी-गहन, भौगोलिक रूप से सीमित और मुख्यतः औपचारिक क्षेत्र के यात्रियों को ही लाभ पहुँचाते हैं।  
  • इसके विपरीत बस-आधारित सार्वजनिक परिवहन, गैर-मोटर चालित परिवहन और अंतिम-मील कनेक्टिविटी—जिन पर अधिकांश शहरी आबादी निर्भर करती है—उन्हें अपेक्षाकृत कम प्राथमिकता दी जाती है। यह स्थिति समावेशी और विस्तार योग्य परिवहन समाधानों की तुलना में अधिक दिखाई देने वाली बुनियादी परियोजनाओं के प्रति नीतिगत झुकाव को दर्शाती है। 

प्रमुख शहरी योजनाओं में कटौती 

  • लगभग सभी महत्वपूर्ण शहरी कल्याण और सेवा योजनाओं के बजट में कमी दर्ज की गई है।
  • प्रधानमंत्री आवास योजना–शहरी (PMAY-U) के बजट में करीब 6 प्रतिशत की कटौती की गई है।
  • स्वच्छ भारत मिशन–शहरी (SBM-U) के लिए आवंटन आधा कर दिया गया है, जिससे स्वच्छता उपलब्धियों और अपशिष्ट प्रबंधन ढांचे की दीर्घकालिक स्थिरता पर सवाल खड़े हो गए हैं। 
  • इसी तरह, जल आपूर्ति और सीवरेज से जुड़ी अमृत योजना के बजट में 20 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि शहर गंभीर जल संकट और पुरानी अवसंरचना की समस्या से जूझ रहे हैं।
  • इन कटौतियों का सीधा असर शहरी जीवन की गुणवत्ता पर पड़ता है और अब तक हुई प्रगति के उलट जाने का खतरा पैदा होता है। 

शहरी शासन और विकास पर व्यापक प्रभाव 

  • केंद्रीय व्यय में की गई इस कटौती की भरपाई न तो राजकोषीय विकेंद्रीकरण के ज़रिये की गई है और न ही नगरपालिकाओं को अतिरिक्त राजस्व जुटाने की शक्तियाँ देकर। परिणामस्वरूप, शहरी स्थानीय निकाय दीर्घकालिक बुनियादी ढांचे की योजना बनाने और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप निर्णय लेने में सीमित रह जाते हैं। 
  • व्यापक दृष्टि से देखें, तो शहरी निवेश में गिरावट भारत की विकास आकांक्षाओं को कमजोर कर सकती है। वैश्विक अनुभव दर्शाता है कि सफल विकास मॉडल मजबूत वित्तीय आधार वाले, समावेशी और उत्पादक शहरों पर टिके होते हैं।
    यदि शहरी विकास को विकास के इंजन के बजाय केवल खर्च का केंद्र माना जाता है, तो इसके दीर्घकालिक आर्थिक और सामाजिक परिणाम नकारात्मक हो सकते हैं। 
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