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कावेरी नदी बेसिन में जल संकट: जलवायु परिवर्तन और भविष्य की चुनौतियाँ

संदर्भ 

  • भारत में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को लेकर अधिकांश अध्ययनों में यह संकेत मिलता है कि आने वाले समय में नदियों के प्रवाह में वृद्धि होगी। हालांकि, कावेरी नदी का बेसिन इस सामान्य प्रवृत्ति से अलग दिखाई देता है। एक अध्ययन के अनुसार 2026 से 2050 के बीच कावेरी में जल प्रवाह लगभग 3.5% तक घट सकता है, जबकि उत्तरी भारत की नदियाँ संभावित बाढ़ की स्थिति का सामना कर सकती हैं। यह अध्ययन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गांधीनगर के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है और इसे Earth's Future पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। 

पृष्ठभूमि: जल विवाद और संवेदनशीलता 

  • कावेरी जल बंटवारा लंबे समय से कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद का कारण रहा है। विशेष रूप से कम वर्षा वाले वर्षों में यह विवाद अधिक तीव्र हो जाता है। 
  • यद्यपि जलवायु मॉडल भविष्य में भारत में वर्षा बढ़ने का संकेत देते हैं, लेकिन कावेरी बेसिन को इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिलने की आशंका है। इस संदर्भ में गोदावरी-कावेरी लिंक परियोजना जैसी नदी जोड़ो योजनाएँ संभावित समाधान के रूप में सामने आती हैं। 

          कावेरी नदी बेसिन के बारे में 

  • कावेरी नदी बेसिन दक्षिण भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र जल विज्ञान क्षेत्र है। इसे दक्षिण की गंगा के रूप में भी जाना जाता है। 

भौगोलिक स्थिति और उद्गम

  • उद्गम : कावेरी नदी कर्नाटक के कोडागु (Coorg) जिले में पश्चिमी घाट की ब्रह्मगिरी पहाड़ियों में तलकावेरी से निकलती है।
  • लंबाई : इसकी कुल लंबाई लगभग 800 किलोमीटर है।
  • विस्तार : इसका बेसिन लगभग 81,155 वर्ग किमी में फैला है, जो मुख्य रूप से तीन राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में आता है:
    • कर्नाटक : (लगभग 42%)
    • तमिलनाडु : (लगभग 54%)
    • केरल : (लगभग 3%)
    • पुडुचेरी : (कराइकल क्षेत्र)

सहायक नदियाँ

  • कावेरी बेसिन की सहायक नदियों को दो भागों में बांटा जा सकता है:
  • बाएं तट की सहायक नदियाँ: हरंगी, हेमवती, अर्कवती और शिमशा।
  • दाएं तट की सहायक नदियाँ: लक्ष्मण तीर्थ, काबिनी, भवानी, नोय्याल, अमरावती और सुवर्णवती।

प्रमुख बांध और झरने

  • कृष्ण राज सागर (KRS) बांध : कर्नाटक में स्थित।
  • मेट्टूर बांध : तमिलनाडु का प्रमुख बांध जो कावेरी के पानी को नियंत्रित करता है।
  • शिवनासमुद्रम जलप्रपात : यह भारत के सबसे पुराने जलविद्युत केंद्रों में से एक के लिए प्रसिद्ध है। 

कृषि और आर्थिक महत्व

  • धान का कटोरा : तमिलनाडु का कावेरी डेल्टा क्षेत्र अपनी उपजाऊ मिट्टी के कारण दक्षिण भारत में चावल उत्पादन का प्रमुख केंद्र है।
  • सिंचाई : यह बेसिन दक्षिण भारत की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जो लाखों किसानों को सिंचाई प्रदान करता है। 

प्रमुख निष्कर्ष 

  • अध्ययन के अनुसार, 1951 से 2012 के बीच कावेरी के जल प्रवाह में लगभग 28% की गिरावट दर्ज की गई। यह निष्कर्ष कोल्लेगल स्टेशन के आंकड़ों पर आधारित है, जिसे नदी के वास्तविक प्रवाह का प्रतिनिधि माना गया है। 
  • शोध में पारंपरिक जलवायु मॉडलों की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए एक प्रतिबंधित मॉडलिंग (constrained modelling) पद्धति अपनाई गई। इसके तहत 1951–2012 की अवधि में नौ प्रमुख नदी बेसिनों—कावेरी, गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, गोदावरी, कृष्णा, महानदी, नर्मदा और तापी के वास्तविक आंकड़ों का विश्लेषण कर भविष्य के अनुमान लगाए गए। 

संस्थागत हस्तक्षेप और कानूनी ढांचा 

  • जल विवाद के समाधान हेतु 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया गया, जिसने 2007 में अपना अंतिम निर्णय दिया। 
  • इसके अनुसार, सामान्य वर्ष में कुल 740 टीएमसी जल उपलब्ध माना गया। बाद में 2018 में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने संशोधित बंटवारा करते हुए तमिलनाडु को 404.25 टीएमसी और कर्नाटक को 284.75 टीएमसी जल आवंटित किया तथा कावेरी को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया।  

हालिया घटनाक्रम 

  • 2023 में वर्षा की कमी के चलते तमिलनाडु ने प्रतिदिन 24,000 क्यूसेक जल की मांग की, जिसे कर्नाटक ने अपनी आंतरिक जरूरतों का हवाला देते हुए अस्वीकार कर दिया।  परिणामस्वरूप दोनों राज्यों में सामाजिक और राजनीतिक तनाव देखने को मिला। 

जलवायु मॉडल और अनिश्चितताएँ 

  • अध्ययन यह भी दर्शाता है कि जलवायु विज्ञान में वर्षा संबंधी पूर्वानुमान अभी भी अनिश्चित हैं। जहाँ सभी मॉडल तापमान वृद्धि पर सहमत हैं, वहीं वर्षा की मात्रा और वितरण को लेकर मतभेद बने हुए हैं। 
  • वस्तुतः 22 मॉडलों में से केवल 8 ही भारतीय मानसून की मौसमी विशेषताओं को सही ढंग से प्रदर्शित कर पाए। ये मॉडल CMIP6 (Coupled Model Intercomparison Project Phase 6) का हिस्सा हैं।  
  • अप्रतिबंधित मॉडलों में कावेरी के प्रवाह में वृद्धि का अनुमान लगाया गया था, लेकिन अधिक विश्वसनीय प्रतिबंधित (constrained) मॉडलों के आधार पर इसके विपरीत परिणाम सामने आए। 
  • इससे स्पष्ट होता है कि कावेरी बेसिन में निकट और मध्य अवधि में जल संकट की संभावना बनी हुई है।  

CMIP क्या है ? 

  • इसे 'विश्व जलवायु अनुसंधान कार्यक्रम' (WCRP) द्वारा संचालित किया जाता है। 
  • इसका मुख्य काम दुनिया भर के विभिन्न देशों (जैसे अमेरिका, चीन, भारत, यूरोप) के जलवायु मॉडलों की तुलना करना और उन्हें एक मानक ढांचे में लाना है ताकि भविष्य की भविष्यवाणियां अधिक सटीक हों।
  • Phase 6: जैसा कि नाम से पता चलता है, यह इस परियोजना का छठा चरण है। इससे पिछला चरण (CMIP5) 'IPCC की पांचवीं मूल्यांकन रिपोर्ट' (AR5) का आधार था। 

भविष्य की राह 

  • कावेरी नदी की स्थिति यह दर्शाती है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव क्षेत्रीय स्तर पर भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। भविष्य में जल प्रबंधन को अधिक वैज्ञानिक, समन्वित और न्यायसंगत बनाने की आवश्यकता है। साथ ही, अंतर-राज्यीय सहयोग, जल संरक्षण तकनीकों और वैकल्पिक उपायों (जैसे नदी जोड़ परियोजनाएँ) पर गंभीरता से विचार करना अनिवार्य होगा।

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