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आस्था, गरिमा और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन: सबरीमाला निर्णय का संवैधानिक विश्लेषण

  • सितंबर 2018 में Indian Young Lawyers Association v. State of Kerala में भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए सभी आयु वर्ग की महिलाओं को केरल के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी। 
  • यह निर्णय केवल मंदिर प्रवेश का विवाद नहीं था, बल्कि इसने भारतीय संविधान के मूल प्रश्न आस्था, समानता, गरिमा और संवैधानिक नैतिकता के बीच संतुलन को केंद्र में ला दिया।
  • यह मामला भारतीय धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की उस जटिल चुनौती को दर्शाता है जिसमें धार्मिक स्वायत्तता और मौलिक अधिकारों का टकराव होता है।

मामले की पृष्ठभूमि

(क) विवादित प्रथा

  • केरल स्थित Sabarimala Temple भगवान अय्यप्पा को समर्पित है। परंपरागत रूप से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं का प्रवेश वर्जित था। 
  • इस निषेध का आधार देवता के ‘नैष्ठिक ब्रह्मचर्य’ स्वरूप को बताया गया।
  • इस बहिष्कार को केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश प्राधिकरण) नियम, 1965 के नियम 3(ब) द्वारा विधिक समर्थन प्राप्त था।

बहुमत का निर्णय (4:1)

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा (तत्कालीन), न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर, न्यायमूर्ति आर.एफ. नरीमन और न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने बहुमत में निर्णय दिया कि:

  • अय्यप्पा भक्त अलग धार्मिक संप्रदाय नहीं हैं।
  • महिलाओं का बहिष्कार अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15 (लैंगिक भेदभाव निषेध) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन है।
  • नियम 3(ब) असंवैधानिक है।
  • संवैधानिक नैतिकता, लैंगिक न्याय और व्यक्तिगत गरिमा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

बहुमत ने स्पष्ट किया कि जैविक विशेषताओं के आधार पर धार्मिक बहिष्कार संवैधानिक मूल्यों के प्रतिकूल है।

असहमति: न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा का दृष्टिकोण

न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने एकमात्र असहमति व्यक्त की। उनका तर्क था कि:

  • धार्मिक समुदायों के सामूहिक अधिकारों को भी संरक्षण प्राप्त है।
  • न्यायालय को धर्मशास्त्रीय प्रश्नों में अत्यधिक हस्तक्षेप से बचना चाहिए।
  • यदि कोई प्रथा धर्म का ‘आवश्यक अंग’ है, तो उसे अनुच्छेद 25-26 के तहत संरक्षण मिलना चाहिए।

उन्होंने आवश्यक धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practices - ERP) सिद्धांत के आधार पर बहिष्कार को मंदिर के धार्मिक चरित्र का हिस्सा माना।

आवश्यक धार्मिक प्रथाओं (ERP) का सिद्धांत

उत्पत्ति

  • ERP सिद्धांत का विकास Shirur Mutt case तथा बाद में Shastri Yagnapurushadji v. Muldas Bhudardas Vaishya जैसे मामलों में हुआ।

इस परीक्षण के अनुसार:

  • यदि कोई प्रथा धर्म के लिए ‘आवश्यक’ है, तो उसे संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होगा।
  • यदि नहीं, तो राज्य उसे विनियमित कर सकता है।

आलोचनाएँ

  • धर्मनिरपेक्ष अदालतें धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या करने लगती हैं।
  • यह सिद्धांत जटिल धार्मिक विवादों को सुलझाने के लिए पर्याप्त प्रक्रियात्मक गहराई नहीं रखता।
  • यदि कोई ‘आवश्यक’ प्रथा गरिमा को ठेस पहुँचाती है, तो भी वह संरक्षण पा सकती है।
  • यह बहिष्करणवादी प्रथाओं को मजबूत कर सकता है।

बहिष्कार-विरोधी परीक्षण: एक संवैधानिक विकल्प

न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया—Anti-Exclusion Test (बहिष्कार-विरोधी परीक्षण)

मूल विचार

  • धर्म को अपने सिद्धांत परिभाषित करने की स्वतंत्रता है।
  • किंतु यदि कोई प्रथा व्यक्तियों को व्यवस्थित रूप से बाहर करती है और उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाती है, तो वह संवैधानिक जांच के अधीन होगी।
  • प्रश्न यह नहीं कि प्रथा ‘आवश्यक’ है या नहीं, बल्कि यह कि क्या उसका प्रभाव समानता और गरिमा के विपरीत है।

आवश्यक धार्मिक प्रथाओं (ERP) बनाम बहिष्कार-विरोधी परीक्षण (Anti-Exclusion Test)

ERP परीक्षण

बहिष्कार-विरोधी परीक्षण

धर्म के लिए अनिवार्यता पर केंद्रित

संवैधानिक प्रभाव पर केंद्रित

न्यायालय धार्मिक व्याख्या करता है

न्यायालय गरिमा और समानता का मूल्यांकन करता है

परंपरा की रक्षा प्राथमिक

वास्तविक समानता की रक्षा प्राथमिक

व्यापक संवैधानिक निहितार्थ

सबरीमाला से उत्पन्न सिद्धांत अन्य मामलों में भी लागू हो सकते हैं:

  • Dawoodi Bohra community में बहिष्कार प्रथा
  • पारसी महिलाओं के विवाह संबंधी अधिकार

भारत का संविधान अनुच्छेद 25-26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन ये अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन हैं। इसलिए सामुदायिक स्वायत्तता पूर्ण नहीं है।

धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक नैतिकता

भारतीय धर्मनिरपेक्षता ‘सिद्धांतवादी दूरी’ (principled distance) पर आधारित है न तो धर्म के प्रति शत्रुता, न पूर्ण अधीनता। संविधान का परिवर्तनकारी दृष्टिकोण (transformative constitutionalism) सामाजिक पदानुक्रम को समाप्त कर समान नागरिकता स्थापित करने की ओर अग्रसर है।

बहिष्कार-विरोधी दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि:

  • धर्म सिद्धांत में स्वायत्त रहे,
  • परंतु व्यवहार में संवैधानिक मूल्यों के प्रति जवाबदेह हो।

सबरीमाला मंदिर

  • यह  भारत के केरल राज्य में पथानमथिट्टा जिले के पश्चिमी घाट में स्थित एक प्राचीन और पवित्र हिंदू मंदिर है।
  • यह मंदिर भगवान अय्यप्पा को समर्पित है, जिन्हें हरिहरपुत्र (भगवान विष्णु और भगवान शिव के पुत्र) माना जाता है। 
  • यह मंदिर अपनी भव्यता, कठिन तीर्थयात्रा, और आध्यात्मिक महत्व के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

अन्य विशेषताएं:

  • भगवान अय्यप्पा का मंदिर:
    • भगवान अय्यप्पा को तपस्वी और योगियों का देवता माना जाता है।
    • उनकी मूर्ति पद्मासन मुद्रा में स्थापित है, जो ध्यान और आत्मसंयम का प्रतीक है।
    • मंदिर के मुख्य देवता भगवान अय्यप्पा हैं, जिन्हें मणिकंठन स्वामी भी कहा जाता है।
  •  स्थान और प्राकृतिक सौंदर्य:
    • सबरीमाला घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच स्थित है।
    • यह मंदिर पश्चिमी घाट की 18 पहाड़ियों के बीच स्थित है, जिनमें पेरियार टाइगर रिजर्व भी शामिल है।
    • मंदिर समुद्र तल से लगभग 4,133 फीट (1,260 मीटर) की ऊंचाई पर है।
  • पवित्र 18 सीढ़ियां (पथिनेट्टम पड़ी):
    • मंदिर के गर्भगृह तक जाने के लिए श्रद्धालुओं को 18 पवित्र सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।
    • ये सीढ़ियां भक्तों के समर्पण और साधना का प्रतीक हैं।
    • केवल 41 दिन के व्रत का पालन करने वाले भक्त ही इन सीढ़ियों पर चढ़ सकते हैं।
  • मकरज्योति और मकरविल्लुकु:
    • मकरज्योति सबरीमाला के सबसे प्रमुख आकर्षणों में से एक है।
    • मकर संक्रांति के दिन पहाड़ों की चोटी पर एक दिव्य प्रकाश दिखता है, जिसे लाखों श्रद्धालु देखने आते हैं।
    • इसे भगवान अय्यप्पा का आशीर्वाद माना जाता है।
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