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कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज 33 (COP33) और भारत का बदलता वैश्विक दृष्टिकोण

संदर्भ 

  • दिसंबर 2023 में दुबई (सीओपी28) के दौरान भारत ने वर्ष 2028 में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (सीओपी33) की मेजबानी का महत्वाकांक्षी प्रस्ताव रखा था। यह कदम सफल G20 शिखर सम्मेलन के बाद भारत की वैश्विक नेतृत्व की आकांक्षाओं के अनुरूप था। हालांकि, वर्ष 2026 तक आते-आते वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों और घरेलू आर्थिक प्राथमिकताओं के पुनर्मूल्यांकन ने भारत को इस निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य किया। भारत का मेजबानी से पीछे हटना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह उसके विकास-प्रथम (Development-First) दृष्टिकोण की एक सुदृढ़ घोषणा है। 

जलवायु कूटनीति में नीतिगत बदलाव: विकास-प्रथम रणनीति 

भारत के वर्तमान जलवायु दृष्टिकोण में आया बदलाव राष्ट्रीय हितों और वैश्विक अपेक्षाओं के बीच एक रणनीतिक संतुलन का परिणाम है।

  • कार्बन स्पेस और समानता : भारत का स्पष्ट मानना है कि पेरिस समझौता विकासशील देशों के लिए अब भी असंतुलित है। तीव्र आर्थिक विकास के लिए भारत को अधिक कार्बन स्पेस (Carbon Space) की आवश्यकता है, जिसे वैश्विक उत्सर्जन कटौती के कड़े लक्ष्य सीमित कर सकते हैं। 
  • अनुकूलन बनाम शमन (Adaptation vs Mitigation) : भारत ने वैश्विक विमर्श को केवल शमन (उत्सर्जन कम करना) से हटाकर  अनुकूलन (जलवायु प्रभावों से निपटने की क्षमता) पर केंद्रित करने की वकालत की है। भारत के अनुसार, गरीबी उन्मूलन और बुनियादी ढांचे का विकास ही जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध सबसे प्रभावी दीर्घकालिक सुरक्षा है। 
  • जलवायु वित्त और जवाबदेही : भारत ने पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 के तहत विकसित देशों की वित्तीय प्रतिबद्धताओं पर कड़ा रुख अपनाया है। विकसित देशों द्वारा वादे के अनुसार तकनीक और फंड मुहैया न कराना भारत की बढ़ती मुखरता का प्रमुख कारण है।  

सीओपी33 की मेजबानी: रणनीतिक दुविधा और चुनौतियाँ 

मेजबानी से पीछे हटने का निर्णय भारत की नीतिगत स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने का एक प्रयास है।

  • ग्लोबल स्टॉकटेक (GST) का दबाव : 2028 में होने वाले सीओपी33 में दूसरा ग्लोबल स्टॉकटेक संपन्न होना है। मेजबान देश के रूप में भारत पर वैश्विक उत्सर्जन लक्ष्यों को और अधिक महत्वाकांक्षी बनाने का दबाव होता, जो उसकी घरेलू ऊर्जा सुरक्षा (विशेषकर कोयले पर निर्भरता) के विपरीत जा सकता था।  
  • अंतरराष्ट्रीय निगरानी : दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक होने के नाते, मेजबानी के दौरान भारत की घरेलू नीतियां वैश्विक जांच के दायरे में होतीं। भारत किसी भी ऐसी स्थिति से बचना चाहता है जहाँ उसे अपनी ऊर्जा संप्रभुता से समझौता करना पड़े। 
  • वैश्विक विश्वास की कमी : सीओपी29 के बाद विकसित और विकासशील देशों के बीच बढ़ती खाई और अमेरिका जैसे बड़े देशों के अनिश्चित जलवायु रुख ने भारत को यह सोचने पर मजबूर किया कि वैश्विक सहमति बनाना फिलहाल एक कठिन और जोखिम भरा कार्य है। 

आईपीसीसी (IPCC) एआर7 (AR7) और भारत की रणनीतिक सोच 

जलवायु विज्ञान और कूटनीति के बीच का टकराव भारत की चिंताओं को और बढ़ाता है।

  • आकलन रिपोर्ट (AR7) का समय : आईपीसीसी की सातवीं रिपोर्ट को 2028 के जीएसटी को प्रभावित करने के लिए समय से पहले जारी करने का प्रस्ताव है। भारत और चीन जैसे देशों ने इसका विरोध किया है, क्योंकि उनका मानना है कि वैज्ञानिक प्रतिनिधित्व में असंतुलन और अधूरी समीक्षा विकासशील देशों पर अनुचित दबाव डाल सकती है।  
  • ऊर्जा सुरक्षा की प्राथमिकता : वैश्विक स्तर पर जीवाश्म ईंधन से तत्काल अलगाव (Phase-out) के प्रस्तावों के बीच भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहता है।

निष्कर्ष: एक संतुलित और यथार्थवादी निर्णय 

  • सीओपी33 की मेजबानी से पीछे हटने का निर्णय यह स्पष्ट करता है कि भारत अब केवल वैश्विक छवि के बजाय राष्ट्रीय सामर्थ्य को प्राथमिकता दे रहा है। भारत ने यह संदेश दिया है कि जलवायु नेतृत्व का अर्थ वैश्विक दबावों के आगे झुकना नहीं, बल्कि अपने नागरिकों के विकास के अधिकार की रक्षा करते हुए एक न्यायसंगत और संतुलित मॉडल की वकालत करना है। वस्तुतः यह निर्णय भारत की जलवायु कूटनीति के एक नए, अधिक मुखर और यथार्थवादी युग की शुरुआत है, जहाँ वैश्विक प्रतिबद्धताएँ राष्ट्रीय विकास की कीमत पर नहीं होंगी।
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