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GS Foundation (P+M) - Delhi : 23rd March 2026, 11:30 AM GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 15th March 2026 GS Foundation (P+M) - Delhi : 23rd March 2026, 11:30 AM GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 15th March 2026

आर्थिक अवसरों में लैंगिक असमानता बरकरार, विश्व बैंक की चेतावनी

चर्चा में क्यों ?

विश्व बैंक समूह की नवीनतम “महिला, व्यवसाय और कानून” (Women, Business and the Law) रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं को समान आर्थिक अवसर प्रदान करने वाले कानूनों का विश्व स्तर पर औसतन केवल आधा ही क्रियान्वयन हो रहा है। यह स्थिति वैश्विक विकास और रोजगार सृजन की क्षमता को प्रभावित कर रही है।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:

  • अधिकांश देश कानूनी पर्याप्तता के मामले में औसतन 100 में से 67 अंक प्राप्त करते हैं।
  • कानूनों के क्रियान्वयन (Implementation) का औसत स्कोर घटकर 53 रह जाता है।
  • अधिकारों को लागू करने के लिए आवश्यक संस्थागत प्रणालियों का स्कोर मात्र 47 है।
  • विश्व की केवल 4% महिलाएं ऐसी अर्थव्यवस्थाओं में रहती हैं जहां लगभग पूर्ण कानूनी समानता उपलब्ध है।
  • पूर्ण क्रियान्वयन की स्थिति में भी महिलाओं को पुरुषों के कानूनी अधिकारों का केवल दो-तिहाई हिस्सा ही मिल पाएगा।

मूल्यांकन के प्रमुख क्षेत्र (10 आयाम)

  • रिपोर्ट महिलाओं की आर्थिक भागीदारी का मूल्यांकन निम्न क्षेत्रों में करती है:
    • हिंसा से सुरक्षा
    • बाल देखभाल तक पहुंच
    • उद्यमिता
    • रोजगार सुरक्षा
    • संपत्ति स्वामित्व
    • सेवानिवृत्ति सुरक्षा

प्रमुख चुनौतियां

  • हिंसा से सुरक्षा
    • आवश्यक सुरक्षा कानूनों का केवल एक-तिहाई ही मौजूद।
    • 80% मामलों में उनका प्रभावी प्रवर्तन नहीं।
    • सुरक्षा की कमी महिलाओं की कार्यबल भागीदारी को सीमित करती है।
  • द्यमिता में बाधाएं
    • अधिकांश देशों में व्यवसाय शुरू करने की कानूनी अनुमति समान।
    • लेकिन केवल आधी अर्थव्यवस्थाएं महिलाओं को ऋण तक समान पहुंच देती हैं।
    • वित्तपोषण की कमी महिला उद्यमिता को बाधित करती है।
  • बाल देखभाल  
    • 190 में से आधे से कम देशों में परिवारों को वित्तीय/कर सहायता।
    • आवश्यक नीतियों का केवल 30% ही लागू।
    • निम्न आय वाले देशों में सहायता तंत्र मात्र 1%।
  • आर्थिक प्रभाव
    • अगले दशक में 1.2 अरब युवा कार्यबल में प्रवेश करेंगे, जिनमें आधी महिलाएं होंगी।
    • लैंगिक समानता में सुधार से GDP वृद्धि और रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा।
    • महिलाओं की आर्थिक भागीदारी केवल सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक आवश्यकता है।
  • सकारात्मक प्रगति
    • पिछले दो वर्षों में 68 अर्थव्यवस्थाओं द्वारा 113 कानूनी सुधार।
    • उप-सहारा अफ्रीका में सर्वाधिक 33 सुधार।
    • मिस्र को शीर्ष सुधारक घोषित किया गया।

भारत के संदर्भ में प्रासंगिकता

  • संवैधानिक आधार: समानता की गारंटी
  • भारतीय संविधान महिलाओं को समान अधिकार प्रदान करता है:
    • अनुच्छेद 14 - विधि के समक्ष समानता
    • अनुच्छेद 15(1) - धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव निषिद्ध
    • अनुच्छेद 15(3) - महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान की अनुमति
    • अनुच्छेद 16 - सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर
  • इसके अतिरिक्त, राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 39 (a) और (d) पुरुषों और महिलाओं के लिए समान आजीविका और समान वेतन की बात करते हैं।

महिला श्रमबल भागीदारी दर (FLFP) - एक चुनौती

  • भारत में महिला श्रमबल भागीदारी दर (Female Labour Force Participation Rate) अभी भी कई विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं से कम है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित कार्य में महिलाओं की भागीदारी अधिक, परंतु औपचारिक क्षेत्र में कम।
  • शहरी क्षेत्रों में शिक्षा बढ़ने के बावजूद रोजगार के अवसर सीमित।
  • कारण:
    • सामाजिक-पारिवारिक दायित्व
    • सुरक्षित कार्यस्थलों की कमी
    • वेतन असमानता
    • कौशल और बाजार की मांग में अंतर
  • आर्थिक प्रभाव: कम भागीदारी से GDP वृद्धि और जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) पर नकारात्मक प्रभाव।

प्रमुख नीति पहलें

  • मातृत्व लाभ
    • मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017 के तहत सवैतनिक अवकाश 12 से बढ़ाकर 26 सप्ताह।
    • कार्यस्थल पर क्रेच सुविधा का प्रावधान।
  • स्टैंड-अप इंडिया योजना
    • Stand Up India Scheme के तहत महिला एवं SC/ST उद्यमियों को ऋण सहायता।
    • उद्यमिता को बढ़ावा।
  • स्वयं सहायता समूह (SHGs)
    • राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत SHGs के माध्यम से वित्तीय समावेशन।
    • ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर।
  • जनधन योजना
    • प्रधानमंत्री जन धन योजना के माध्यम से बैंकिंग सुविधा।
    • DBT के जरिए महिलाओं की वित्तीय स्वायत्तता में वृद्धि।

कानून और क्रियान्वयन के बीच अंतर

  • हालांकि कानून प्रगतिशील हैं, परंतु जमीनी स्तर पर समस्याएं बनी हुई हैं:
    • श्रम कानूनों की निगरानी कमजोर
    • कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव और असुरक्षा
    • क्रेच और बाल देखभाल सुविधाओं का अभाव
    • औपचारिक वित्तीय संस्थानों तक सीमित पहुंच
    • सामाजिक मानसिकता और पितृसत्तात्मक संरचना
  • उदाहरण: मातृत्व लाभ अधिनियम का लाभ मुख्यतः औपचारिक क्षेत्र की महिलाओं को मिलता है, जबकि बड़ी संख्या अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है।

आगे की राह  

  • लैंगिक बजटिंग को प्रभावी बनाना
  • सुरक्षित कार्यस्थल (POSH कानून का सख्त पालन)
  • कौशल विकास एवं डिजिटल साक्षरता
  • बाल देखभाल अवसंरचना का विस्तार
  • सामाजिक जागरूकता अभियान

विश्व बैंक

विश्व बैंक एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था है, जो विकासशील देशों को गरीबी उन्मूलन, बुनियादी ढांचे के विकास और आर्थिक सुधारों के लिए वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान करती है।

स्थापना एवं मुख्यालय

  • स्थापना: 1944 (ब्रेटन वुड्स सम्मेलन)
  • मुख्यालय: वॉशिंगटन डी.सी., अमेरिका
  • उद्देश्य: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पुनर्निर्माण और विकास

संरचना  

विश्व बैंक समूह में पाँच संस्थाएं शामिल हैं:

  • IBRD (International Bank for Reconstruction and Development)
  • मध्यम आय वाले देशों को ऋण

IDA (International Development Association)

  • अत्यंत गरीब देशों को रियायती ऋण/अनुदान

IFC (International Finance Corporation)

  • निजी क्षेत्र में निवेश

4MIGA (Multilateral Investment Guarantee Agency)

  • निवेश जोखिम बीमा
  • ICSID (International Centre for Settlement of Investment Disputes)
  • निवेश विवादों का निपटारा

प्रमुख उद्देश्य

  • अत्यधिक गरीबी को समाप्त करना
  • साझा समृद्धि को बढ़ावा देना
  • सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) में सहयोग
  • शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, जलवायु परिवर्तन, महिला सशक्तिकरण आदि क्षेत्रों में सहायता

कार्यप्रणाली

  • सदस्य देशों को कम ब्याज दर पर ऋण
  • तकनीकी सलाह और नीति समर्थन
  • अनुसंधान और रिपोर्ट (जैसे World Development Report, Women, Business and the Law)

भारत और विश्व बैंक

  • भारत विश्व बैंक का संस्थापक सदस्य है।
  • बुनियादी ढांचे, ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वच्छता, स्वास्थ्य और डिजिटल सुधारों में सहयोग।
  • भारत, IDA से सहायता प्राप्त करने वाला प्रमुख देश रहा है।

निष्कर्ष

रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि कानून बनाना पर्याप्त नहीं, उनका प्रभावी क्रियान्वयन और संस्थागत समर्थन अनिवार्य है। महिलाओं के लिए समान आर्थिक अवसर सुनिश्चित करना केवल सामाजिक न्याय का प्रश्न नहीं, बल्कि सतत और समावेशी विकास की पूर्वशर्त है।

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