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भारत की आईईए सदस्यता: पूर्ण सदस्यता के मार्ग में कानूनी बाधाएँ

चर्चा में क्यों ?

हाल ही में पेरिस में आयोजित मंत्रिस्तरीय बैठक में अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने पूर्ण सदस्यता के लिए भारत के अनुरोध पर हुई प्रगति को स्वीकार किया। भारत वर्तमान में IEA का “सहयोगी सदस्य” (Association Country) है।

प्रमुख बिन्दु

  • भारत ने अक्टूबर 2023 में औपचारिक रूप से पूर्ण सदस्यता के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था। 
  • यह मुद्दा भारत-अमेरिका द्विपक्षीय वार्ताओं में भी प्रमुखता से उठा है। 
  • मंत्रिस्तरीय बैठक में प्रतिनिधियों ने भारत के साथ जारी वार्ताओं और तकनीकी चर्चा में हुई प्रगति का स्वागत किया।

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA): उत्पत्ति और भूमिका

  • IEA की स्थापना 1974 में योम किप्पुर युद्ध के दौरान अरब तेल प्रतिबंध से उत्पन्न वैश्विक ऊर्जा संकट के बाद की गई थी। 
  • उस समय तेल की कीमतों में भारी वृद्धि और आपूर्ति संकट ने आयातित तेल पर निर्भर औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं की कमजोरी उजागर कर दी थी।
  • इसके जवाब में, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के 17 सदस्य देशों ने मिलकर IEA की स्थापना की।

मूल उद्देश्य:

  • तेल आपूर्ति की स्थिरता सुनिश्चित करना
  • आपूर्ति व्यवधानों की पूर्व-तैयारी
  • ऊर्जा डेटा और नीति समन्वय

आपातकालीन तंत्र और रणनीतिक भंडार

  • IEA के ढांचे की प्रमुख विशेषता यह है कि प्रत्येक पूर्ण सदस्य को अपने शुद्ध तेल आयात के बराबर कम-से-कम 90 दिनों का रणनीतिक तेल भंडार बनाए रखना होता है।
  • इस सामूहिक आपातकालीन तंत्र को कई बार सक्रिय किया गया है, जैसे:
    • 1991 का खाड़ी युद्ध
    • 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद ऊर्जा संकट
  • यह व्यवस्था सदस्य देशों को सामूहिक रूप से बाजार में तेल छोड़ने की अनुमति देती है, जिससे वैश्विक आपूर्ति स्थिर रहती है।

सदस्यता संरचना: क्यों जटिल है भारत की दावेदारी ?

  • वर्तमान में IEA के 32 पूर्ण सदस्य हैं। 
  • हाल ही में OECD में शामिल होने के बाद कोलंबिया 33वां सदस्य बना।
  • हालाँकि, IEA के संस्थापक कानूनी ढांचे के अनुसार पूर्ण सदस्यता केवल OECD देशों तक सीमित है। 
  • भारत OECD का सदस्य नहीं है और न ही फिलहाल इसमें शामिल होने की इच्छा रखता है।
  • इसलिए भारत की पूर्ण सदस्यता के लिए दो विकल्पों पर विचार किया जा सकता है:
    • IEA के संस्थापक चार्टर में संशोधन
    • विशेष अपवाद (Special Dispensation)
  • इसी कारण भारत की सदस्यता “स्वचालित” नहीं है, बल्कि कानूनी और संस्थागत संशोधन पर निर्भर है।

सहयोगी सदस्य के रूप में भारत

  • 2015 में IEA ने गैर-OECD देशों को सहयोगी सदस्य के रूप में शामिल करने की व्यवस्था शुरू की। 
  • भारत 2017 में सहयोगी सदस्य बना।
  • वर्तमान में 13 सहयोगी सदस्य हैं। 
  • सहयोगी देश:
    • नीतिगत चर्चाओं में भाग लेते हैं
    • तकनीकी सहयोग प्राप्त करते हैं
    • परंतु मतदान अधिकार नहीं रखते
  • यही कारण है कि भारत पूर्ण सदस्यता चाहता है, ताकि निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में औपचारिक भूमिका निभा सके।

भारत पूर्ण सदस्यता क्यों चाहता है ?

  1. निर्णय-निर्माण में भागीदारी
    • पूर्ण सदस्यता से भारत को मतदान अधिकार मिलेगा और ऊर्जा नीतियों के निर्धारण में प्रत्यक्ष प्रभाव होगा।
  2. ऊर्जा सुरक्षा
    • भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है। आने वाले दशकों में ऊर्जा मांग में सर्वाधिक वृद्धि भारत में होने का अनुमान है।
  3.  ऊर्जा संक्रमण और जलवायु नेतृत्व
    • IEA अब केवल तेल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यह नवीकरणीय ऊर्जा, कार्बन उत्सर्जन में कमी, ऊर्जा दक्षता और स्वच्छ प्रौद्योगिकी पर भी कार्य करता है।
    • IEA ने भारत की “लाइफ (Lifestyle for Environment)” पहल पर विशेष रिपोर्ट जारी की है, जिसमें अनुमान लगाया गया है कि जीवनशैली में परिवर्तन से 2030 तक 2 अरब टन तक वैश्विक उत्सर्जन में कमी संभव है।

बदलती वैश्विक ऊर्जा गतिशीलता

  • IEA की स्थापना के समय इसके सदस्य देश वैश्विक ऊर्जा मांग के 60% से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते थे। 
  • यह हिस्सा घटकर लगभग 40% रह गया था।
  • हालाँकि, भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, मिस्र और थाईलैंड जैसे सहयोगी देशों को शामिल करने पर “IEA परिवार” अब वैश्विक ऊर्जा मांग का लगभग 80% प्रतिनिधित्व करता है।
  • यह तथ्य दर्शाता है कि IEA की प्रासंगिकता अब उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भागीदारी पर निर्भर करती है।

भारत-IEA संबंध: गहराता सहयोग

  • भारत-केंद्रित ऊर्जा रिपोर्ट और डेटा पहल
  • आपातकालीन प्रतिक्रिया अभ्यासों में भागीदारी
  • स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण पर तकनीकी सहयोग
  • महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals) कार्यक्रम में सहयोग
  • IEA ने भारत की बढ़ती केंद्रीय भूमिका को स्वीकार किया है और पूर्ण सदस्यता की दिशा में सकारात्मक संकेत दिए हैं।

निष्कर्ष

  • भारत की IEA पूर्ण सदस्यता वैश्विक ऊर्जा शासन में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत हो सकती है। परंतु OECD-आधारित कानूनी ढांचा इसकी राह में मुख्य बाधा है।
  • यदि संस्थागत संशोधन होते हैं, तो यह न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करेगा, बल्कि IEA को भी अधिक प्रतिनिधिक और समावेशी वैश्विक संस्था में परिवर्तित करेगा।
  • ऊर्जा संक्रमण और जलवायु कार्रवाई के इस दौर में भारत की भूमिका निर्णायक है—और IEA की पूर्ण सदस्यता उस दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।
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