संदर्भ
- भारतीय कृषि को पारंपरिक रूप से मानसून का जुआ कहा जाता है, और समकालीन आर्थिक परिदृश्य में यह उक्ति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। इस वर्ष मानसून के प्रथम मास (जून) में दर्ज की गई 40% की भारी वर्षा-न्यूनता (Deficit) तथा भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा जुलाई में भी सामान्य से कम (दीर्घकालिक औसत के 94% से कम) वर्षा के पूर्वानुमान ने भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष बहुआयामी चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं।
- मौसम विज्ञान उप-मंडलों में सामान्य से 39.8% की यह संचयी गिरावट न केवल कृषि क्षेत्र, बल्कि जल संसाधन, जलविद्युत उत्पादन और व्यापक समष्टि अर्थशास्त्र (Macroeconomics) के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
सुपर अल नीनो का खतरा और आर्थिक संचरण तंत्र (Transmission Mechanism)
- केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा संभावित सुपर अल नीनो (Super El Niño) के संदर्भ में जारी की गई चेतावनी विशेष रूप से देश के उन 55% वर्षा-आधारित (Rainfed) कृषि क्षेत्रों के लिए चिंताजनक है जो अपनी सिंचाई आवश्यकताओं के लिए पूर्णतः दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर हैं।
- एक कमजोर मानसून भारतीय अर्थव्यवस्था को मुख्य रूप से तीन अंतर्संबंधित माध्यमों से आघात पहुँचाता है:
- कृषि उत्पादन में ह्रास (सकल मूल्य वर्धित/जीवीए में कमी)
- ग्रामीण डिस्पोजेबल आय में गिरावट (सकल मांग/Aggregate Demand में संकुचन)
- खाद्य आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान (खाद्य मुद्रास्फीति/ खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि)
उत्पादन का जोखिम और घरेलू मुद्रास्फीति का परिदृश्य
यद्यपि भारत ने पिछले विपणन वर्ष (2024-25) में 357.73 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) के रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन के साथ एक मजबूत बेस (आधार) निर्मित किया था, परंतु वर्तमान मौसमी व्यवधान इस संवेग (Momentum) को बाधित कर सकता है।
- फसल पैटर्न में बदलाव: रेटिंग एजेंसी क्रिसिल (CRISIL) के अनुसार, जल की कमी की स्थिति में किसान मक्का और सब्जियों जैसे उच्च लागत वाले विकल्पों के स्थान पर कम जल-गहन और कम खेती लागत वाली फसलों (जैसे दालों) की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे आवश्यक खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित होगी।
- मौद्रिक नीति पर प्रभाव: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपने जून बुलेटिन में स्पष्ट किया है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून की प्रतिकूलता देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) संवृद्धि-मुद्रास्फीति (Growth-Inflation Matrix) के संतुलन को बिगाड़ सकती है। मई 2026 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति का 3.5% से बढ़कर 3.9% होना तथा खाद्य तेल, आलू, प्याज और टमाटर जैसी बुनियादी वस्तुओं की कीमतों में निरंतर वृद्धि होना केंद्रीय बैंक की इस चिंता को पुष्ट करता है।
व्यापक समष्टि अर्थशास्त्र (Macroeconomy) पर प्रभाव और बाहरी मोर्चे पर चुनौतियाँ
भारतीय सकल मूल्य वर्धन (GVA) में कृषि का योगदान भले ही लगभग 20% हो, परंतु यह देश के 46% कार्यबल को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आने वाला कोई भी संरचनात्मक व्यवधान संपूर्ण आर्थिक मांग चक्र को प्रभावित करता है।
ग्रामीण मांग में संकुचन:
- कृषि आय में संभावित 10% तक की गिरावट ग्रामीण गैर-कृषि क्षेत्रों (जैसे निर्माण और स्थानीय सेवाएं) को अत्यधिक सीमित कर देगी। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव ऑटोमोबाइल (विशेषकर दुपहिया वाहनों और ट्रैक्टरों) की बिक्री तथा टियर-2 और टियर-3 शहरों के रियल एस्टेट क्षेत्र पर पड़ता है।
- वित्तीय अनुमानों (Kotak Mutual Fund) के अनुसार, अल नीनो और सूखे का यह संयुक्त प्रभाव देश की जीडीपी संवृद्धि दर को 20 से 65 आधार अंक (Basis Points) तक क्षति पहुँचा सकता है।
भू-राजनीतिक सह-प्रभाव (Geopolitical Co-effects):
- वर्तमान संकट केवल मौसम तक सीमित नहीं है। पश्चिम एशिया (विशेषकर ईरान युद्ध) में जारी संघर्ष के कारण उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है। यद्यपि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹41,533 करोड़ की पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) को मंजूरी दी है, लेकिन यदि घरेलू उत्पादन में कमी आती है, तो सरकार को बफर स्टॉक जारी करने और आयात पर निर्भर होना पड़ेगा। इससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit - CAD) विस्तृत होगा और विनिमय दर (रुपये) पर अवमूल्यन का दबाव बढ़ेगा।
अल नीनो का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और आपदा सह्यता (Disaster Resilience)
- ऐतिहासिक साक्ष्य दर्शाते हैं कि वर्ष 1972, 1982, 2009 और 2015 के भीषण सूखे अल नीनो के प्रभाव में ही आए थे। वर्ष 2009 और 2015 की तुलनात्मक केस स्टडी यह समझने में मदद करती है कि मजबूत नीतिगत हस्तक्षेप कितना महत्वपूर्ण है:
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संकेतक
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वित्त वर्ष 2009-10
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वित्त वर्ष 2015-16
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सिंचाई कवर
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45% से कम
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सुधार की ओर अग्रसर
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फसल GVA प्रभाव
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2.5% और 3.2% का संकुचन
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अपेक्षाकृत स्थिर
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मुद्रास्फीति की स्थिति
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दहाई अंकों (Double-Digit) में
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सरकार के सक्रिय आपूर्ति प्रबंधन और वैश्विक मंदी के कारण नियंत्रित
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- संरचनात्मक सुधारों के कारण अल नीनो के प्रारंभिक दौर (वित्त वर्ष 2003, 2010) की तुलना में खरीफ उत्पादन का औसत नुकसान 17% से घटकर अब केवल 1.4% (वित्त वर्ष 2015 के बाद) रह गया है। इसके बावजूद, यदि मौसम की मार लगातार दूसरे वर्ष पड़ती है, तो संचयी ह्रास कहीं अधिक विनाशकारी हो सकता है।
नीतिगत आवश्यकता: सूखा-सुरक्षित (Drought-Proofing) अर्थव्यवस्था की ओर
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश के 315 जिले मानसून की संवेदनशीलता के दायरे में हैं, जिनमें से 12 राज्यों के 111 जिले अपर्याप्त सिंचाई बुनियादी ढांचे के कारण अति-संवेदनशील श्रेणी में आते हैं। लगातार गिरता भूजल स्तर इस संकट को और गंभीर बनाता है। वस्तुतः भारत को अपनी नीतिगत प्राथमिकताओं में निम्नलिखित बदलाव करने की आवश्यकता है:
- पूर्व-जोखिम न्यूनीकरण (Ex-ante Risk Reduction): केवल फसल बीमा जैसी पश्च-आपदा (Post-disaster) वित्तीय सुरक्षा पर निर्भर रहने के बजाय, जोखिम को समय से पूर्व कम करने वाली नीतियों पर सार्वजनिक निवेश बढ़ाना होगा।
- कृषि-वैज्ञानिक अनुसंधान: सूखा-प्रतिरोधी और उच्च उपज देने वाली (Climate-Resilient Crops) किस्मों के विकास और उनकी किसानों तक त्वरित पहुँच सुनिश्चित करने के लिए अनुसंधान और विकास (R&D) में बजटीय आवंटन बढ़ाना अनिवार्य है।
- बीमा योजनाओं का मूल्यांकन: केवल फसल बीमा पर संसाधन व्यय करने के स्थान पर इसके वास्तविक-समय मूल्यांकन और वितरण तंत्र की समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि संकट के समय किसानों को तत्काल सूखा राहत और प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता (DBT) प्रदान की जा सके।
निष्कर्ष
वेपडेजेस्ट्रेंट या चिकित्सा विज्ञान की भांति ही कृषि अर्थशास्त्र में भी निवारण (Prevention), उपचार (Cure) से बेहतर है। 2026 में कमजोर मानसून और वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता का यह दुर्लभ संयोग भारतीय नीति-निर्माताओं के लिए व्यापक संरचनात्मक सुधारों को गति देने का एक अवसर है, ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था को मौसमी अनिश्चितताओं के प्रति पूर्णतः प्रतिरोधी (Resilient) बनाया जा सके।