संदर्भ
पृथ्वी के निकट अंतरिक्ष (Near-Earth Space) के सटीक मॉडल के विकास की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की है। शोधकर्ताओं ने पहली बार भारत क्षेत्र के ऊपरी आयनमंडल (Topside Ionosphere) का पुनर्निर्माण करने के लिए भू-आधारित (Ground-based) तथा अंतरिक्ष-आधारित (Space-based) प्रेक्षणों को एकीकृत करने वाली एक नवीन पद्धति विकसित की है। वस्तुतः यह तकनीक उपग्रह संचालन, रेडियो संचार तथा नौवहन (Navigation) प्रणालियों की सटीकता और विश्वसनीयता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
आयनमंडल क्या है?
- आयनमंडल पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल का एक आयनीकृत (Ionized) भाग है, जो वायुमंडलीय तथा आयनमंडलीय विद्युत-गतिकीय प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- इस क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन घनत्व में होने वाले दैनिक एवं मौसमी परिवर्तन विभिन्न आवृत्तियों की रेडियो तरंगों के प्रसार को प्रभावित करते हैं। विशेष रूप से उच्च आवृत्ति (HF) रेडियो तरंगें आयनमंडल से परावर्तित होकर लंबी दूरी तक संचार संभव बनाती हैं।
- इसके अतिरिक्त, जीपीएस तथा भारत की नाविक (NavIC) जैसी उपग्रह-आधारित नौवहन प्रणालियाँ भी आयनमंडल में होने वाले परिवर्तनों से प्रभावित होती हैं।
सटीक इलेक्ट्रॉन घनत्व मापन की आवश्यकता
- विश्वसनीय संचार एवं नौवहन सेवाओं के लिए आयनमंडल में ऊँचाई के साथ इलेक्ट्रॉन घनत्व के परिवर्तन को समझना अत्यंत आवश्यक है।
- भूमध्यरेखीय क्षेत्रों, विशेषकर भारतीय क्षेत्र में, आयनमंडल की गतिशीलता अत्यधिक जटिल होती है। लगभग 1000 किलोमीटर तक इलेक्ट्रॉन घनत्व की सटीक जानकारी आवश्यक है क्योंकि अधिकांश निम्न पृथ्वी कक्षा (Low Earth Orbit-LEO) के उपग्रह इसी ऊँचाई के भीतर संचालित होते हैं।
पारंपरिक मॉडलों की सीमाएँ
- भारतीय क्षेत्र में पर्याप्त प्रेक्षणों के अभाव में अधिकांश पारंपरिक आयनमंडलीय मॉडल ऊपरी आयनमंडल की माप ऊँचाई को स्थिर मानते रहे हैं। इस कारण ऊपरी आयनमंडल के वास्तविक स्वरूप का सटीक आकलन संभव नहीं हो पाता था, जिससे मॉडलिंग एवं पूर्वानुमानों में त्रुटियाँ उत्पन्न होती थीं।
नई पद्धति की विशेषताएँ
इस चुनौती का समाधान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान (Indian Institute of Geomagnetism-IIG) के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है।
- कॉस्मिक रेडियो ऑकल्टेशन (Cosmic Radio Occultation) से प्राप्त स्केल हाइट (Scale Height) की ऊँचाई-आधारित जानकारी का उपयोग किया गया।
- इसे आयनोसॉन्ड (Ionosonde) द्वारा प्राप्त बॉटमसाइड इलेक्ट्रॉन घनत्व मापों के साथ एकीकृत किया गया।
- दोनों प्रकार के प्रेक्षणों के संयोजन से टॉपसाइड इलेक्ट्रॉन घनत्व प्रोफाइल (Electron Density Profile-EDP) का अधिक सटीक पुनर्निर्माण संभव हुआ।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
- अध्ययन में तिरुनेलवेली क्षेत्र के आयनोग्राम और पुनर्निर्मित इलेक्ट्रॉन घनत्व प्रोफाइल का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। वर्ष 2014 के लिए मापे गए तथा पुनर्निर्मित इलेक्ट्रॉन घनत्वों के बीच उच्च सहसंबंध पाया गया, जिससे इस नई पद्धति की विश्वसनीयता सिद्ध होती है। साथ ही विभिन्न ऋतुओं के अनुसार इलेक्ट्रॉन घनत्व प्रोफाइल का भी सफल पुनर्निर्माण किया गया।
नई तकनीक का महत्व
यह नई पद्धति निम्नलिखित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान देगी-
- ऊपरी आयनमंडल की संरचना एवं गतिशीलता को बेहतर ढंग से समझने में।
- उपग्रह संचार एवं रेडियो संचार की विश्वसनीयता बढ़ाने में।
- जीपीएस तथा नाविक (NavIC) जैसी नौवहन प्रणालियों की सटीकता में सुधार करने में।
- अंतरिक्ष मौसम (Space Weather) के बेहतर पूर्वानुमान विकसित करने में।
- भूचुंबकीय भूमध्य रेखा के निकट स्थित क्षेत्रों के लिए अधिक सटीक आयनमंडलीय मॉडल तैयार करने में।
भूचुंबकीय भूमध्य रेखा के संदर्भ में उपयोगिता
- भूचुंबकीय भूमध्य रेखा के निकट पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की विशेष संरचना के कारण आयनमंडल की गतिशीलता अत्यधिक जटिल होती है। ऐसे क्षेत्रों में यह नई पद्धति क्षेत्र-विशिष्ट स्केल हाइट के अधिक सटीक अनुमान प्रदान करती है, जिससे आयनमंडलीय मॉडल पहले की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय बनेंगे।
निष्कर्ष
- भू-आधारित एवं अंतरिक्ष-आधारित प्रेक्षणों के एकीकरण पर आधारित यह नई पद्धति भारत के अंतरिक्ष विज्ञान एवं आयनमंडलीय अनुसंधान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
- इससे पृथ्वी के निकट अंतरिक्ष का अधिक सटीक मॉडल तैयार किया जा सकेगा, जो भविष्य में उपग्रह संचालन, संचार, अंतरिक्ष मौसम पूर्वानुमान तथा जीपीएस एवं नाविक (NavIC) जैसी नौवहन प्रणालियों की दक्षता और विश्वसनीयता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।