चर्चा में क्यों ?
- हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने नवंबर 2025 में हुई दो सड़क दुर्घटनाओं का स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognisance) लिया, जिनमें 34 लोगों की मृत्यु हुई थी। फलोदी दुर्घटना बनाम एनएचएआई और अन्य (2025) मामले में न्यायालय ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर सुरक्षित यात्रा के अधिकार को अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार) के अंतर्गत मौलिक अधिकार माना।
- इस दौरान न्यायालय ने अनुच्छेद 142 के अंतर्गत अपनी असाधारण शक्ति का प्रयोग करते हुए “पूर्ण न्याय” (Complete Justice) सुनिश्चित करने के लिए सरकार को व्यापक निर्देश जारी किए। इसके बाद अनुच्छेद 142 की सीमा, आवश्यकता और प्रभाव को लेकर बहस तेज हो गई है।

भारत में सड़क सुरक्षा संकट : न्यायालय के हस्तक्षेप की पृष्ठभूमि
- सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के पीछे सड़क दुर्घटनाओं से जुड़े चिंताजनक आँकड़े थे-
- राष्ट्रीय राजमार्ग भारत की कुल सड़कों का केवल 2% भाग हैं, लेकिन इन पर लगभग 30% सड़क दुर्घटना मृत्यु होती हैं।
- वर्ष 2025 के पहले छह महीनों में राष्ट्रीय राजमार्गों पर लगभग 26,770 लोगों की मृत्यु हुई।
- वर्ष 2024 की तुलना में मृत्यु दर में लगभग 11% की कमी आई, फिर भी स्थिति गंभीर बनी हुई है।
- भारत सरकार ने 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं में 50% कमी लाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
- इसके लिए “4E रणनीति” अपनाई गई है-
सड़क सुरक्षा के चार स्तंभ (4E Strategy)
- Education (शिक्षा) - यातायात जागरूकता और सुरक्षित ड्राइविंग व्यवहार को बढ़ावा देना।
- Engineering (इंजीनियरिंग) - सड़क डिजाइन एवं अवसंरचना में सुधार।
- Enforcement (प्रवर्तन) - यातायात नियमों का प्रभावी अनुपालन।
- Emergency Medical Services (आपात चिकित्सा सेवाएँ) - दुर्घटना के बाद त्वरित उपचार व्यवस्था।
अनुच्छेद 142 क्या है ?
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 Supreme Court of India को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह किसी भी लंबित मामले में “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश या डिक्री जारी कर सके।
अनुच्छेद 142(1)
- सर्वोच्च न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए किसी भी लंबित वाद या मामले में पूर्ण न्याय करने हेतु आवश्यक आदेश या डिक्री पारित कर सकता है।
- यह शक्ति न्यायालय को ऐसी परिस्थितियों में राहत देने की अनुमति देती है, जहाँ मौजूदा कानून अपर्याप्त हों,
प्रक्रिया संबंधी बाधाएँ न्याय में अवरोध बन रही हों और कानून में रिक्तता (Legal Gap) मौजूद हो।
- इसी कारण अनुच्छेद 142 को “संवैधानिक सुरक्षा वाल्व (Constitutional Safety Valve)” भी कहा जाता है।
अनुच्छेद 142 की प्रकृति
- अनुच्छेद 142 की शक्ति अवशिष्ट (Residuary) एवं असाधारण प्रकृति की है।
- इसके प्रमुख आयाम निम्नलिखित हैं-
- कानूनी रिक्तताओं को भरने का माध्यम
- जब सामान्य कानून समाधान देने में असफल हो जाए, तब यह शक्ति प्रयोग में लाई जाती है।
- संवैधानिक शक्ति
- यह शक्ति किसी अधिनियम से नहीं, बल्कि सीधे संविधान से प्राप्त होती है।
- प्रक्रियात्मक न्याय से आगे
- यह न्यायालय को कठोर प्रक्रियात्मक सीमाओं से आगे जाकर वास्तविक न्याय सुनिश्चित करने की अनुमति देती है।
- असाधारण परिस्थितियों में प्रयोग
- आमतौर पर इसका उपयोग तब होता है जब कोई स्पष्ट त्रुटि हो, तथा न्यायालय के हस्तक्षेप न करने से गंभीर अन्याय हो सकता हो।
अनुच्छेद 142 की न्यायिक व्याख्या
दिल्ली न्यायिक सेवा संघ बनाम गुजरात राज्य (1991)
- मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 142 के अंतर्गत “पूर्ण न्याय” प्रदान करने की शक्ति सामान्य कानूनों से भिन्न एवं उच्च स्तर की संवैधानिक शक्ति है, इसलिए सामान्य विधिक प्रावधान इसकी सीमाएँ निर्धारित नहीं कर सकते।
- इस निर्णय ने संवैधानिक न्याय को प्रक्रियात्मक बाधाओं से ऊपर रखते हुए वास्तविक न्याय सुनिश्चित करने की अवधारणा को सुदृढ़ किया।
केनरा बैंक बनाम देबाशीष दास (2003)
- मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान का उद्देश्य केवल औपचारिक या प्रक्रियात्मक न्याय नहीं, बल्कि वास्तविक (Substantive) न्याय सुनिश्चित करना है; इसलिए जहाँ कानूनी न्याय पर्याप्त न हो या न्याय प्रदान करने में असफल हो जाए, वहाँ प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
हितेश भटनागर बनाम दीपा भटनागर (2011)
- मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 142 के अंतर्गत प्राप्त असाधारण शक्तियों का प्रयोग अत्यधिक सावधानी, न्यायिक संयम तथा विवेकपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिए, ताकि “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करते समय संवैधानिक संतुलन और न्यायिक मर्यादा बनी रहे।
“पूर्ण न्याय” की आवश्यकता क्यों ?
- यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या न्याय कभी अपूर्ण हो सकता है? इसका उत्तर कानून (Law) और न्याय (Justice) के बीच मौजूद अंतर में निहित है।
- कानून किसी विशेष समय की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बनाए जाते हैं, लेकिन समय के साथ समाज में नए परिवर्तन और चुनौतियाँ उभरती रहती हैं, जैसे- लिव-इन संबंध, LGBTQ+ अधिकार, पर्यावरणीय संकट, डिजिटल निजता (Digital Privacy) तथा तकनीकी परिवर्तन।
- ऐसी परिस्थितियों में कई बार मौजूदा कानूनी ढाँचा न्याय प्रदान करने के लिए पर्याप्त नहीं रह जाता। इसलिए अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को यह संवैधानिक शक्ति प्रदान करता है कि वह औपचारिक न्याय (Legal Justice) और वास्तविक न्याय (Substantive Justice) के बीच की दूरी को समाप्त करते हुए “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित कर सके।
क्या उच्च न्यायालय भी “पूर्ण न्याय” दे सकते हैं ?
- अनिल कुमार जैन बनाम माया जैन (2009) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के अंतर्गत प्राप्त शक्तियाँ, सर्वोच्च न्यायालय की अनुच्छेद 142 के अंतर्गत “पूर्ण न्याय” प्रदान करने वाली असाधारण शक्तियों के समान नहीं हैं।
- फिर भी उच्च न्यायालय अपने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के भीतर सीमित दायरे में न्याय सुनिश्चित कर सकते हैं। अर्थात दोनों के बीच अंतर सिद्धांत का नहीं, बल्कि अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) और शक्तियों की सीमा (Scope) का है।
अनुच्छेद 142 और शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) की बहस
- अनुच्छेद 142 के प्रयोग को लेकर सबसे प्रमुख आलोचना न्यायिक अतिक्रमण (Judicial Overreach) की रही है। आलोचकों का तर्क है कि इस प्रावधान के माध्यम से न्यायपालिका कई बार स्थापित विधिक प्रक्रियाओं से आगे बढ़ते हुए कार्यपालिका और विधायिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप कर सकती है तथा ऐसे मामलों में भी प्रभाव डाल सकती है, जो मूलतः नीतिगत निर्णयों के दायरे में आते हैं।
- उनके अनुसार, अनुच्छेद 142 के व्यापक प्रयोग से न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) कभी-कभी न्यायिक अतिक्रमण का रूप ले सकती है, जिससे विधायिका की भूमिका कमजोर होने, शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर प्रभाव पड़ने तथा न्यायिक विवेक (Judicial Discretion) के अत्यधिक विस्तार जैसी चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
प्रतिवाद : न्यायिक सक्रियता
- अनुच्छेद 142 के समर्थकों के अनुसार इसे केवल न्यायिक अतिक्रमण के रूप में देखना उचित नहीं है, क्योंकि न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) बदलती सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों में न्याय सुनिश्चित करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है।
- उनके अनुसार, अनुच्छेद 142 का मूल उद्देश्य सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं कानूनी न्याय को प्रभावी रूप से लागू करना है। न्यायालय इस असाधारण शक्ति का प्रयोग सामान्य परिस्थितियों में नहीं करता, बल्कि तब करता है जब अन्य संवैधानिक संस्थाएँ निष्क्रिय हो जाएँ, या मौजूदा कानून बदलती परिस्थितियों के अनुरूप न्याय प्रदान करने में अपर्याप्त सिद्ध हों।
- ऐसे मामलों में अनुच्छेद 142 न्यायालय को वास्तविक और पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने का संवैधानिक आधार प्रदान करता है।
निष्कर्ष
- अनुच्छेद 142 भारतीय संविधान की सबसे विशिष्ट व्यवस्थाओं में से एक है। यह सर्वोच्च न्यायालय को प्रक्रियात्मक सीमाओं से आगे बढ़कर “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने की शक्ति देता है।
- हालाँकि इसकी असाधारण प्रकृति के कारण इसका प्रयोग संयम, विवेक और संवैधानिक संतुलन के साथ किया जाना आवश्यक है।
- हालिया सड़क सुरक्षा निर्णय दर्शाता है कि अनुच्छेद 142 आज भी कानून और न्याय के बीच सेतु का कार्य कर रहा है, विशेषकर उन परिस्थितियों में जहाँ विधायी व्यवस्था तत्काल समाधान देने में सक्षम नहीं होती।