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जातिगत जनगणना: कार्यप्रणाली, चुनौतियाँ, महत्त्व एवं आगे की राह

संदर्भ 

  • भारत में जनगणना केवल जनसंख्या की गणना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शासन, विकास योजनाओं, संसाधनों के वितरण तथा सामाजिक-आर्थिक नीतियों के निर्माण का आधार भी है। वर्ष 2027 की जनगणना कई दृष्टियों से ऐतिहासिक होगी। यह स्वतंत्र भारत की पहली पूर्णतः डिजिटल जनगणना होगी, जिसमें पहली बार जनसंख्या गणना के साथ सभी वर्गों की जातियों का भी आधिकारिक आकलन किया जाएगा। साथ ही नागरिकों को स्वयं गणना (Self-enumeration) का विकल्प भी उपलब्ध कराया जाएगा। 
  • इसी उद्देश्य से 6 जुलाई 2026 से 16 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में जनगणना के दूसरे चरण का पूर्वाभ्यास (Pre-test) प्रारंभ किया गया है, जो 20 जुलाई 2026 तक चलेगा। इस अभ्यास के आधार पर जाति गणना की अंतिम कार्यप्रणाली निर्धारित की जाएगी। उल्लेखनीय है कि पूर्वाभ्यास में उत्तरदाताओं को अपनी जाति दर्ज करने के लिए खुला कॉलम (Open Column) दिया गया है, जिसने जाति गणना की पद्धति को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • भारत में अंतिम बार सभी जातियों की व्यापक गणना वर्ष 1931 की जनगणना में हुई थी। स्वतंत्रता के बाद केवल अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) की जनसंख्या का नियमित आंकलन किया जाता रहा। लंबे समय तक जाति आधारित जनगणना का विरोध करने के बाद केंद्र सरकार ने 30 अप्रैल 2025 को घोषणा की कि जनगणना 2027 में सभी जातियों की गणना की जाएगी। इससे पहले विभिन्न विपक्षी दलों तथा अनेक क्षेत्रीय दलों ने जातिगत आंकड़ों की आवश्यकता पर बल दिया था।

जाति जनगणना की आवश्यकता 

  • भारत की सामाजिक संरचना में जाति आज भी शिक्षा, रोजगार, आय, भूमि स्वामित्व, स्वास्थ्य तथा सामाजिक अवसरों को प्रभावित करने वाला महत्त्वपूर्ण कारक है। 
  • अद्यतन जातिगत आंकड़ों के अभाव में सामाजिक न्याय संबंधी नीतियों, आरक्षण व्यवस्था तथा लक्षित कल्याणकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन कठिन हो जाता है। विश्वसनीय आंकड़े नीति-निर्माण को अधिक साक्ष्य-आधारित (Evidence-based) बनाने में सहायक हो सकते हैं। 

2011 की सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना से प्राप्त अनुभव

  • वर्ष 2011 की सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना (SECC) नियमित जनगणना का हिस्सा नहीं थी। इसमें उत्तरदाताओं को अपनी जाति स्वयं लिखने का विकल्प दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 46 लाख अलग-अलग जाति नाम दर्ज हुए। 
  • अनेक लोगों ने जाति के स्थान पर उपजाति, उपनाम या स्थानीय सामाजिक पहचान लिख दी। उदाहरणस्वरूप, बनिया समुदाय के लोगों ने गुप्ता या अग्रवाल को ही अपनी जाति के रूप में दर्ज कराया। इससे आंकड़ों का वर्गीकरण अत्यंत जटिल हो गया और जातिगत आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए। 

वर्तमान पूर्वाभ्यास की प्रमुख विशेषताएँ 

  • वर्तमान पूर्वाभ्यास में भी जाति दर्ज करने के लिए खुला कॉलम उपलब्ध कराया गया है, हालांकि इसे अंतिम व्यवस्था नहीं माना गया है। सरकार इस माध्यम से विभिन्न विकल्पों की व्यवहारिकता का परीक्षण कर रही है। 
  • इस बार पहली बार स्वयं गणना (Self-enumeration) तथा डिजिटल डेटा संग्रहण की व्यवस्था भी अपनाई जा रही है। अंतिम प्रश्नावली पूर्वाभ्यास से प्राप्त सुझावों और अनुभवों के आधार पर तैयार की जाएगी। 

जाति गणना की प्रमुख चुनौतियाँ 

  • जाति गणना की सबसे बड़ी चुनौती जाति की स्पष्ट परिभाषा है। भारत में जाति, उपजाति, समुदाय, गोत्र और उपनाम के बीच अंतर हमेशा स्पष्ट नहीं होता, जिससे एक ही समुदाय कई नामों से दर्ज हो सकता है। 
  • दूसरी चुनौती मानकीकरण (Standardisation) की है। यदि खुला कॉलम रखा जाता है तो लाखों प्रविष्टियों का वर्गीकरण कठिन होगा, जबकि पूर्वनिर्धारित सूची अपनाने पर अनेक स्थानीय जातियाँ छूट सकती हैं। 
  • तीसरी चुनौती संघीय ढाँचे से जुड़ी है। केंद्र और राज्यों की ओबीसी सूचियाँ अलग-अलग हैं। वर्तमान में केंद्रीय सूची में लगभग 2,650 ओबीसी, 1,170 एससी तथा 890 एसटी समुदाय अधिसूचित हैं, जबकि राज्यों की अपनी पृथक सूचियाँ हैं।
  • इसके अतिरिक्त आंकड़ों की विश्वसनीयता और राजनीतिक संवेदनशीलता भी महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं। जातिगत आंकड़ों के सार्वजनिक होने के बाद आरक्षण, प्रतिनिधित्व तथा संसाधनों के वितरण से जुड़े नए राजनीतिक और सामाजिक विमर्श उभर सकते हैं। 

कार्यप्रणाली को लेकर चिंताएँ 

  • विपक्षी दलों ने अंतिम प्रश्नावली तैयार करने से पूर्व व्यापक सार्वजनिक एवं विशेषज्ञ परामर्श की मांग की है। सरकार का कहना है कि जनगणना प्रश्नावली को अंतिम रूप देने से पहले उसका क्षेत्रीय परीक्षण किया जाता है तथा विभिन्न हितधारकों के सुझावों को शामिल किया जाता है। गृह मंत्रालय के अनुसार अंतिम प्रश्नावली स्थापित प्रक्रियाओं के अनुरूप तैयार की जाएगी। 

जनगणना में विलंब एवं 2027 की विशेषताएँ 

  • वर्ष 2021 की प्रस्तावित जनगणना COVID-19 महामारी के कारण स्थगित हुई। बाद में डिजिटल प्रणाली के विकास और प्रशासनिक तैयारियों के कारण भी प्रक्रिया आगे बढ़ी। सरकार ने घोषणा की है कि जनसंख्या जनगणना एवं जाति गणना वर्ष 2027 तक दो चरणों में पूरी की जाएगी। 
  • लगभग 24 लाख गणना खंड (Enumeration Blocks) बनाए गए हैं तथा 30 लाख सरकारी कर्मचारियों को गणनाकर्मी नियुक्त किया गया है। जनगणना अधिनियम, 1948 के अंतर्गत यह प्रक्रिया अनिवार्य होगी और पहली बार पूर्णतः डिजिटल माध्यम से संपन्न की जाएगी। 

महत्त्व एवं आगे की राह 

  • यदि जाति जनगणना वैज्ञानिक, पारदर्शी एवं त्रुटिरहित ढंग से संपन्न होती है, तो यह सामाजिक न्याय, लक्षित कल्याणकारी योजनाओं तथा साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को सुदृढ़ आधार प्रदान कर सकती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक असमानताओं का अधिक यथार्थ विश्लेषण भी संभव होगा।
  • इसके लिए आवश्यक है कि जातियों का मानकीकृत वर्गीकरण, खुली प्रविष्टियों के लिए वैज्ञानिक कोडिंग प्रणाली, केंद्र एवं राज्यों के बीच समन्वित डाटाबेस, व्यापक विशेषज्ञ परामर्श तथा डेटा गोपनीयता के स्पष्ट मानक सुनिश्चित किए जाएँ।

निष्कर्ष 

  • वर्ष 2027 की जाति जनगणना भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक नीति निर्माण की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है। यह केवल जनसंख्या का सांख्यिकीय अभ्यास नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक संरचना को तथ्यपरक रूप से समझने का प्रयास भी है। 
  • यद्यपि इसकी कार्यप्रणाली, मानकीकरण और राजनीतिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियाँ गंभीर हैं, फिर भी यदि इसे वैज्ञानिक, पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से संपन्न किया जाता है, तो यह समावेशी विकास, साक्ष्य-आधारित शासन तथा सामाजिक न्याय को सुदृढ़ करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। 
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