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हिमालयी याक (Himalayan yaks)

चर्चा में क्यों ? 

  • हाल ही में हिमालय में अंतरराष्ट्रीय सीमा के निकट ऊँचाई वाले क्षेत्रों में रहने वाले याकों के स्वास्थ्य और उनकी गतिविधियों पर निगरानी रखने के लिए वैज्ञानिकों ने इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) आधारित एक अत्याधुनिक स्मार्ट प्रणाली विकसित की है। 

हिमालयी याक  (Himalayan yaks) के बारे में

  • याक मूल रूप से बोविनी (Bovini) कुल का सदस्य है। इस श्रेणी में जंगली भैंसे (bison), मवेशी और घरेलू भैंसें भी आती हैं।
  • यह जीव अत्यधिक सर्द मौसम के लिए अनुकूलित है और -40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान को सहन कर सकता है।  
  • ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में खुद को ढालने के लिए इनके शरीर पर लंबे और घने बाल होते हैं। 

प्राकृतिक आवास और भौगोलिक विस्तार 

  • भारतीय याक (Bos grunniens) को हिमालय का जहाज़ भी कहा जाता है। यह पर्वतीय समुदायों की आजीविका का प्रमुख आधार है, क्योंकि स्थानीय लोग मांस, दूध तथा परिवहन जैसी आवश्यकताओं के लिए इस पशु पर निर्भर रहते हैं। 
  • समुद्र तल से 8,000 फीट से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पाए जाने वाले इस गोवंशीय पशु की पहचान कठिन जलवायु और विषम परिस्थितियों में भी जीवित रहने की अद्भुत क्षमता के कारण होती है। 
  • 20वीं पशुधन जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 58 हजार याक हैं। इनमें से लगभग आधी संख्या लद्दाख में निवास करती है, जबकि शेष अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पाई जाती है।
  • हिमालय के विशाल एवं दुर्गम भूभाग में याकों के स्वास्थ्य की नियमित निगरानी करना लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रही है। विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे दुर्गम इलाकों में याकों की आवाजाही पर नजर रखना याक विशेषज्ञों और ब्रोकपा (याक पालकों) के लिए भी आसान नहीं होता। 

मुख्य चुनौतियाँ और खतरे:

  • ग्लोबल वार्मिंग (जलवायु परिवर्तन): पहाड़ों पर लगातार बढ़ रहे तापमान के कारण गर्मियों के महीनों में याक हीट स्ट्रेस (थर्मल असंतुलन) से प्रभावित हो रहे हैं। तापमान का यह उतार-चढ़ाव उनके शारीरिक चक्र को नुकसान पहुंचा रहा है। 
  • बॉर्डर सीलिंग और इनब्रीडिंग (अंतःप्रजनन): भू-राजनीतिक तनावों और युद्धों की वजह से सीमाएं पूरी तरह बंद हो चुकी हैं। इसके चलते दूसरे देशों या मूल क्षेत्रों से नए याक (विजातीय जीन पूल/जर्मप्लाज्म) का आना रुक गया है। सीमित दायरों में रहने के कारण ये जीव इनब्रीडिंग का शिकार हो रहे हैं, जिससे उनकी आनुवंशिक विविधता कमजोर हो रही है।     

जियो-फेंसिंग एवं स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली 

  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के राष्ट्रीय याक अनुसंधान केंद्र (NRC-Y), दिरांग (अरुणाचल प्रदेश) के निदेशक मिहिर सरकार ने बताया कि इन व्यावहारिक समस्याओं के समाधान के लिए यह नई तकनीक विकसित की गई है। इसके अंतर्गत एक विशेष इलेक्ट्रॉनिक उपकरण को याक के गले में पहनाए जाने वाले कॉलर से जोड़ा जाता है।

विशेषताएं: 

  • यह IoT आधारित स्मार्ट प्रणाली याकों की जियो-फेंसिंग, स्वास्थ्य संबंधी निगरानी तथा उन पर पड़ने वाले तनाव (Stress) का पूर्वानुमान लगाने में सक्षम है। 
  • इसे विशेष रूप से उन दूरस्थ एवं उच्च हिमालयी क्षेत्रों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जहाँ पशुओं पर निरंतर प्रत्यक्ष निगरानी रखना संभव नहीं हो पाता।

इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) क्या है ?

  • इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) ऐसी आधुनिक तकनीक है, जिसमें सेंसर, सॉफ्टवेयर और इंटरनेट कनेक्टिविटी से लैस विभिन्न उपकरण आपस में जुड़े रहते हैं। 
  • ये उपकरण स्वतः सूचनाएँ एकत्र करते हैं, उनका आदान-प्रदान करते हैं तथा आवश्यक कार्य बिना मानवीय हस्तक्षेप के संपन्न कर सकते हैं।

जियो-फेंसिंग (Geo-fencing) तकनीक क्या है ? 

  • जियो-फेंसिंग (Geo-fencing) एक ऐसी डिजिटल तकनीक है, जिसके माध्यम से जीपीएस, वाईफाई अथवा सेल्युलर नेटवर्क की सहायता से किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र के चारों ओर एक आभासी सीमा (Virtual Boundary) निर्धारित की जाती है। 
  • यदि कोई पशु इस निर्धारित सीमा के भीतर या बाहर जाता है, तो उसकी जानकारी तुरंत प्राप्त की जा सकती है।  
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