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IBC vs PMLA : NCLAT के ऐतिहासिक फैसले के प्रमुख बिंदु, महत्व और प्रभाव

प्रारंभिक परीक्षा

BC की धारा 14 (मोरेटोरियम), PMLA के तहत 'अपराध की कमाई' (Proceeds of Crime) की परिभाषा, और NCLAT/NCLT के अधिकार-क्षेत्र

मुख्य परीक्षा 

GS Paper III: भारतीय अर्थव्यवस्था (बैंकिंग, सुधार, NPA), कॉर्पोरेट गवर्नेंस, मनी लॉन्ड्रिंग और देश की सुरक्षा।

GS Paper II: वैधानिक निकाय (Statutory Bodies - NCLT, NCLAT, ED), न्यायिक समीक्षा और अधिकार-क्षेत्र का टकराव।

चर्चा में क्यों ?

  • हाल ही में राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) ने एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर किसी कंपनी ने अपराध या घोटाले से संपत्ति बनाई है, तो उसे दिवाला कानून (IBC) की आड़ लेकर बचाया नहीं जा सकता।
  • अधिकरण ने बेहद कड़े शब्दों में कहा-"संसद ने IBC को कोई 'पवित्र गंगा' नहीं बनाया है, जिसमें धोकर किसी कंपनी के आपराधिक कर्मों को माफ कर दिया जाए।"

क्या है मामला ?

  • यह पूरा मामला सिद्धि विनायक लॉजिस्टिक्स लिमिटेड नाम की कंपनी से जुड़ा है:
  • कंपनी के मालिकों (प्रमोटर्स) पर बैंकों से करीब 1,600 करोड़ रुपये का घोटाला, धोखाधड़ी और पैसों की हेराफेरी का आरोप है।
  • साल 2017 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कार्रवाई करते हुए मनी लॉन्ड्रिंग कानून (PMLA) के तहत कंपनी की संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क (जब्त) कर लिया।
  • इसके कुछ समय बाद कंपनी कंगाल (दिवालिया) हो गई और उस पर IBC के तहत मोरेटोरियम (Moratorium) लागू हो गया।

'मोरेटोरियम' क्या होता है ?

  • जब कोई कंपनी दिवालिया होने की कगार पर होती है, तो कोर्ट उसे कुछ समय के लिए मोरेटोरियम (राहत अवधि) देता है। 
  • इस दौरान कंपनी के खिलाफ कोई नया केस नहीं हो सकता।
  • बैंक या लेनदार अपनी वसूली के लिए कंपनी की संपत्ति नहीं बेच सकते।
  • इसका मकसद कंपनी को दोबारा पैरों पर खड़ा करने का मौका देना होता है।

टकराव कहाँ हुआ ? 

  • कंपनी के दिवालिया होने की प्रक्रिया देख रहे अधिकारी (Liquidator) ने कोर्ट में दलील दी कि जब कंपनी पर मोरेटोरियम लागू है, तो ED उसकी संपत्ति को कुर्क या जब्त नहीं कर सकता, क्योंकि इससे बैंकों का पैसा डूब जाएगा।

दोनों कानूनों (IBC और PMLA) में टकराव क्यों ?

  • दोनों कानूनों के उद्देश्य एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं:

कानून

मुख्य उद्देश्य

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016

दिवालिया या वित्तीय संकट में फंसी कंपनियों का समयबद्ध समाधान करना तथा बैंकों एवं अन्य लेनदारों की अधिकतम वसूली सुनिश्चित करना।

धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002

मनी लॉन्ड्रिंग (धन शोधन) पर रोक लगाना, अपराध से अर्जित संपत्ति (Proceeds of Crime) की पहचान, कुर्की और जब्ती सुनिश्चित करना तथा आर्थिक अपराधों पर नियंत्रण करना।

  • जब कोई संपत्ति घोटाले की कमाई से बनी हो और वो कंपनी दिवालिया हो जाए, तब दोनों कानून आमने-सामने आ जाते हैं।

NCLAT ने अपने फैसले में क्या कहा ?

NCLAT ने इस टकराव को हमेशा के लिए स्पष्ट करते हुए निम्नलिखित मुख्य बातें कहीं :

  • मोरेटोरियम केवल 'ईमानदार' संपत्ति पर: दिवाला कानून (IBC) का मोरेटोरियम केवल कंपनी की कानूनी और वैध संपत्तियों की रक्षा करता है। घोटाले या अपराध से कमाई गई संपत्ति (Proceeds of Crime) पर इसका कोई अधिकार नहीं है।
  • राष्ट्रीय हित सर्वोपरि: भले ही दिवाला प्रक्रिया में बैंकों या लेनदारों को थोड़ा कम पैसा मिले, लेकिन मनी लॉन्ड्रिंग (काले धन) के खिलाफ देश के राष्ट्रीय हित से समझौता नहीं किया जा सकता।
  • ED की कार्रवाई सही: दिवाला प्रक्रिया का इस्तेमाल ED को घोटाले की संपत्ति जब्त करने से रोकने के लिए एक ढाल के रूप में नहीं किया जा सकता।

क्या दिवाला अदालतें (NCLT/NCLAT) ED की कार्रवाई को रोक सकती हैं ?

  • नहीं। NCLAT ने साफ किया कि दिवाला अदालतों (NCLT या NCLAT) को यह जांचने का कोई अधिकार नहीं है कि ED की कुर्की सही है या गलत।
  • अगर किसी को ED की कार्रवाई से कोई शिकायत है, तो उसे PMLA की स्पेशल कोर्ट में ही जाना होगा।

इस फैसले का क्या असर होगा ? (महत्व)

  • कानूनी भ्रम दूर हुआ : अब यह साफ हो गया है कि आर्थिक अपराध के मामलों में PMLA का पलड़ा IBC से भारी रहेगा।
  • घोटालेबाजों पर नकेल : अपराधी अब अपनी कंपनियों को दिवालिया घोषित करवाकर घोटाले की संपत्ति को बचाने का खेल नहीं खेल पाएंगे।
  • पारदर्शिता : बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को अब केवल उसी संपत्ति से वसूली का अधिकार मिलेगा जो साफ-सुथरी और वैध है।

निष्कर्ष

NCLAT का यह फैसला भारत की आर्थिक व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह संदेश साफ है: व्यापार में घाटा होना एक अलग बात है (जिसके लिए IBC है), लेकिन अपराध और धोखाधड़ी करना बिल्कुल अलग बात है (जिसके लिए PMLA है) ।

प्रारंभिक परीक्षा प्रश्न

प्रश्न: दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 और धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के बीच हालिया कानूनी टकरावों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. IBC का मोरेटोरियम केवल वैध संपत्तियों की रक्षा करता है, अपराध से अर्जित संपत्ति (Proceeds of Crime) की नहीं।

  2. NCLT और NCLAT को PMLA के तहत की गई कुर्की की वैधता की जांच करने का कोई अधिकार नहीं है।

  3. कुर्क संपत्ति को वापस पाने के लिए समाधान पेशेवर (Resolution Professional) को PMLA विशेष न्यायालय में जाना होगा।

उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक कथन

  2. केवल दो कथन

  3. सभी तीन कथन

  4. कोई भी कथन सही नहीं है

मुख्य परीक्षा

प्रश्न: "हाल के न्यायिक निर्णयों के संदर्भ में, IBC के मोरेटोरियम और PMLA के तहत संपत्तियों की कुर्की के बीच बढ़ते कानूनी टकराव तथा इसके आर्थिक प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।"

FAQ: IBC vs PMLA - NCLAT के ऐतिहासिक फैसले से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न: IBC का मुख्य उद्देश्य क्या है ?

उत्तर : दिवालिया कंपनियों का समाधान और लेनदारों की अधिकतम वसूली।

प्रश्न : PMLA का मुख्य उद्देश्य क्या है ?

उत्तर : मनी लॉन्ड्रिंग रोकना और अपराध से अर्जित संपत्तियों को जब्त करना।

प्रश्न: मोरेटोरियम किस धारा में दिया गया है?

उत्तर : IBC की धारा 14।

प्रश्न: 'Proceeds of Crime' किसे कहते हैं?

उत्तर : अपराध से अर्जित धन, संपत्ति या उससे प्राप्त लाभ।

प्रश्न: ED किस कानून के तहत कार्रवाई करता है ?

उत्तर : PMLA, 2002।

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