जॉइंट क्रेडिटिंग मैकेनिज्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6.2 के अंतर्गत संचालित होता है, जो संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) के तहत सहकारी दृष्टिकोणों तथा अंतरराष्ट्रीय रूप से स्थानांतरित शमन परिणामों (ITMOs) के हस्तांतरण को नियंत्रित करता है।
इस तंत्र के अंतर्गत जापानी संस्थाएँ भारत में सीधे उत्सर्जन-घटाने वाली परियोजनाओं में निवेश करती हैं। इन परियोजनाओं में नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और कम-कार्बन अवसंरचना जैसी उन्नत जापानी हरित तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
प्रत्येक परियोजना से होने वाली ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी या अवशोषण का वैज्ञानिक रूप से आकलन किया जाता है। इसके आधार पर उत्पन्न कार्बन क्रेडिट को भारत और जापान के बीच विभाजित किया जाता है, जिसका उपयोग उनके जलवायु लक्ष्यों की पूर्ति में किया जाता है।
नए नियमों के तहत एक संयुक्त समिति (Joint Committee) का गठन किया गया है, जिसमें भारत और जापान दोनों देशों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समिति प्रणाली के प्रशासन, अनुमोदन और निगरानी का कार्य करेगी।
सभी परियोजनाओं में स्वतंत्र तृतीय-पक्ष द्वारा सत्यापन और प्रमाणन अनिवार्य होगा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उत्सर्जन में वास्तविक, स्थायी और अतिरिक्त (additional) कमी हुई है।
इस प्रणाली में मजबूत राष्ट्रीय रजिस्ट्री का उपयोग किया जाएगा, जो कार्बन क्रेडिट के जारी करने, हस्तांतरण और रिकॉर्ड संधारण का कार्य करेगी। इससे दोहरी गणना (double counting) को रोका जा सकेगा और पारदर्शिता सुनिश्चित होगी।
इन परियोजनाओं को कई वित्तीय स्रोतों से सहायता प्राप्त होगी, जिनमें जापान के पर्यावरण मंत्रालय (MOEJ) द्वारा संचालित जॉइंट क्रेडिटिंग मैकेनिज्म मॉडल परियोजनाएँ, एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) के ट्रस्ट फंड तथा नई ऊर्जा और औद्योगिक प्रौद्योगिकी विकास संगठन (NEDO) द्वारा प्रबंधित प्रदर्शन परियोजनाएँ शामिल हैं।
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