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भारत-जापान जॉइंट क्रेडिटिंग मैकेनिज्म (JCM)

संदर्भ 

  • भारत और जापान की सरकारों ने संयुक्त रूप से जॉइंट क्रेडिटिंग मैकेनिज्म (Joint Crediting Mechanism - JCM) के लिए Implementation Rules (कार्यान्वयन नियम) को औपचारिक रूप से स्वीकार किया है।  
  • यह एक महत्वपूर्ण परिचालन उपलब्धि है, जो पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6.2 के तहत एक द्विपक्षीय कार्बन बाजार ढांचे को सक्रिय करती है।  

जॉइंट क्रेडिटिंग मैकेनिज्म (JCM) के बारे में  

  • जॉइंट क्रेडिटिंग मैकेनिज्म (JCM) एक औपचारिक द्विपक्षीय कार्बन क्रेडिटिंग प्रणाली है, जिसे जापान ने विभिन्न साझेदार देशों के साथ मिलकर विकसित किया है। 
  • इसका उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में कमी लाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है। 
  • इसके अंतर्गत विकासशील या संक्रमणशील अर्थव्यवस्थाओं में उन्नत डीकार्बोनाइजेशन तकनीकों, अवसंरचना और उत्सर्जन-नियंत्रण प्रणालियों का कार्यान्वयन किया जाता है। 

कानूनी प्रावधान:

  • जॉइंट क्रेडिटिंग मैकेनिज्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6.2 के अंतर्गत संचालित होता है, जो संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) के तहत सहकारी दृष्टिकोणों तथा अंतरराष्ट्रीय रूप से स्थानांतरित शमन परिणामों (ITMOs) के हस्तांतरण को नियंत्रित करता है।  

उद्देश्य:

  • जॉइंट क्रेडिटिंग मैकेनिज्म का प्रमुख उद्देश्य उच्च-प्रदर्शन और कम-कार्बन तकनीकों के उपयोग तथा प्रसार को तेज करना है।
  • इस तंत्र के माध्यम से सार्वजनिक और निजी पूंजी को उपयोग में लाकर वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को घटाने या समाप्त करने का प्रयास किया जाता है। साथ ही, यह दोनों देशों को उनके राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता करता है। 

कार्यप्रणाली और प्रमुख विशेषताएँ

1. निवेश और तकनीकी हस्तांतरण 

  • इस तंत्र के अंतर्गत जापानी संस्थाएँ भारत में सीधे उत्सर्जन-घटाने वाली परियोजनाओं में निवेश करती हैं। इन परियोजनाओं में नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और कम-कार्बन अवसंरचना जैसी उन्नत जापानी हरित तकनीकों का उपयोग किया जाता है।

2. कार्बन क्रेडिट का परिमाणीकरण 

  • प्रत्येक परियोजना से होने वाली ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी या अवशोषण का वैज्ञानिक रूप से आकलन किया जाता है। इसके आधार पर उत्पन्न कार्बन क्रेडिट को भारत और जापान के बीच विभाजित किया जाता है, जिसका उपयोग उनके जलवायु लक्ष्यों की पूर्ति में किया जाता है। 

3. संयुक्त समिति द्वारा संचालन 

  • नए नियमों के तहत एक संयुक्त समिति (Joint Committee) का गठन किया गया है, जिसमें भारत और जापान दोनों देशों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समिति प्रणाली के प्रशासन, अनुमोदन और निगरानी का कार्य करेगी।

4. सत्यापन और प्रमाणन 

  • सभी परियोजनाओं में स्वतंत्र तृतीय-पक्ष द्वारा सत्यापन और प्रमाणन अनिवार्य होगा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उत्सर्जन में वास्तविक, स्थायी और अतिरिक्त (additional) कमी हुई है। 

5. राष्ट्रीय रजिस्ट्री प्रणाली

  • इस प्रणाली में मजबूत राष्ट्रीय रजिस्ट्री का उपयोग किया जाएगा, जो कार्बन क्रेडिट के जारी करने, हस्तांतरण और रिकॉर्ड संधारण का कार्य करेगी। इससे दोहरी गणना (double counting) को रोका जा सकेगा और पारदर्शिता सुनिश्चित होगी। 

6. बहु-स्रोत वित्तपोषण 

  • इन परियोजनाओं को कई वित्तीय स्रोतों से सहायता प्राप्त होगी, जिनमें जापान के पर्यावरण मंत्रालय (MOEJ) द्वारा संचालित जॉइंट क्रेडिटिंग मैकेनिज्म मॉडल परियोजनाएँ, एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) के ट्रस्ट फंड तथा नई ऊर्जा और औद्योगिक प्रौद्योगिकी विकास संगठन (NEDO) द्वारा प्रबंधित प्रदर्शन परियोजनाएँ शामिल हैं। 

महत्व:

  • जॉइंट क्रेडिटिंग मैकेनिज्म भारत और जापान दोनों को पेरिस समझौते के तहत अपने उत्सर्जन कटौती लक्ष्यों को कार्बन क्रेडिट के माध्यम से प्राप्त करने में सहायता करता है। 
  • यह प्रणाली जापानी पूँजी और तकनीक को आकर्षित करती है, जिससे स्वच्छ ऊर्जा और डीकार्बोनाइजेशन परियोजनाएँ अधिक सुलभ, किफायती और प्रभावी बनती हैं।
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