New
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 8th June 2026, 6:30 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 1st June 2026, 5:30 PM English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 7th June 2026, 8:00 AM Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 8th June 2026, 6:30 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 1st June 2026, 5:30 PM English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 7th June 2026, 8:00 AM

भारत-रूस लॉजिस्टिक्स समझौता

संदर्भ 

  • हाल ही में भारत और रूस के बीच रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट (RELOS) को लेकर सोशल मीडिया पर एक नई बहस छिड़ गई। दावों में कहा गया कि यह समझौता दोनों देशों को एक-दूसरे की भूमि पर 3,000 सैनिकों की स्थायी तैनाती की अनुमति देता है, जिससे इसे एक पूर्ण सैन्य गठबंधन (Military Alliance) के रूप में पेश किया गया। 

लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट (LSA) क्या हैं ? 

  • तकनीकी रूप से, एलएसए (LSA) दो मित्र देशों की सेनाओं के बीच प्रशासनिक और परिचालन संबंधी प्रक्रियाओं को सरल बनाने का एक कानूनी ढाँचा है। 

मूल उद्देश्य: 

  • इसका प्राथमिक उद्देश्य किसी भी देश में सैन्य अड्डों की स्थापना करना नहीं है, बल्कि संयुक्त अभ्यासों, मानवीय सहायता, आपदा राहत (HADR) और पोर्ट कॉल्स के दौरान एक-दूसरे के बेस, बंदरगाहों और हवाई अड्डों का उपयोग ईंधन भरने, मरम्मत और रसद (सप्लाई) के लिए सुगम बनाना है।      

नौकरशाही में कमी: 

  • यह समझौता सैन्य स्तर पर होने वाले वित्तीय और प्रशासनिक लेन-देन को एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया में ढालता है, जिससे रेड-टेपिस्म (लालफीताशाही) कम होती है। 

वैश्विक संदर्भ: भारत के बढ़ते रणनीतिक संपर्क 

भारत आज दुनिया के नौ देशों के साथ ऐसे रसद समझौतों (LSAs) का संचालन कर रहा है, जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम, सिंगापुर और रूस शामिल हैं (ओमान के साथ यह व्यवस्था एक व्यापक रक्षा समझौते के अंतर्गत है)। इन समझौतों की उपयोगिता व्यावहारिक रूप से सिद्ध हो चुकी है: 

  • परिचालन क्षमता में वृद्धि : अदन की खाड़ी में समुद्री डकैती विरोधी अभियानों के दौरान भारतीय नौसेना के युद्धपोतों और पी-8आई विमानों ने भारत लौटे बिना इन समझौतों के जरिए त्वरित लॉजिस्टिक सहायता प्राप्त की।  
  • आपातकालीन आपूर्ति : 2020 में पूर्वी लद्दाख गतिरोध के दौरान, भारत ने अमेरिका के साथ लेमोआ का उपयोग कर अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए विशेष शीतकालीन वस्त्र प्राप्त किए।
  • द्विपक्षीय लाभ : हाल ही में ब्रिटेन की रॉयल नेवी ने भी भारतीय शिपयार्डों में स्पेयर पार्ट्स और रखरखाव सेवाओं के लिए इस तंत्र का लाभ उठाया है।  

क्या है भारत-रूस रेलोस का सच ?

  • 18 फरवरी 2025 को मॉस्को में हस्ताक्षरित और दिसंबर 2025 में रूसी राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित रेलोस का स्वरूप भी अन्य समझौतों जैसा ही है। सोशल मीडिया पर चर्चित 3,000 सैनिकों का आंकड़ा दरअसल कोई स्थायी सैन्य तैनाती नहीं, बल्कि एक अधिकतम ऊपरी सीमा (Cap) है। 
  • यह सीमा इसलिए तय की गई है ताकि बड़े पैमाने पर होने वाले संयुक्त अभ्यासों या नौसैनिक दौरों के दौरान कर्मियों, जहाजों और विमानों की संख्या को पूर्व-निर्धारित दायरे में रखा जा सके। अधिकारियों के अनुसार, इन सैनिकों की मौजूदगी केवल विशिष्ट गतिविधियों (जैसे युद्धाभ्यास या पोर्ट कॉल) की अवधि तक ही सीमित रहेगी और यह किसी भी प्रकार की दीर्घकालिक या स्थायी उपस्थिति की अनुमति नहीं देता है। 

निष्कर्ष: भू-राजनीतिक निहितार्थ और आर्कटिक का नया मार्ग 

  • रेलोस को एक सैन्य ब्लॉक के रूप में देखना रणनीतिक नासमझी होगी। भारत की विदेश नीति हमेशा गुटनिरपेक्षता और सामरिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) पर आधारित रही है। जहाँ एक तरफ भारत-अमेरिका के साथ बहुपक्षीय अभ्यास बढ़ा रहा है, वहीं रूस के साथ यह समझौता उसकी संतुलित कूटनीति का हिस्सा है। 
  • इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक पहलू आर्कटिक क्षेत्र में स्थित रूसी सैन्य और रसद सुविधाओं तक भारत की पहुँच सुनिश्चित करना है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण जैसे-जैसे आर्कटिक में नए व्यापारिक और नौवहन मार्ग खुल रहे हैं, रेलोस भारत को इस सुदूर लेकिन संसाधन-समृद्ध क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बढ़त प्रदान करेगा।
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR