भारत की “3F” चिंताएँ: ईंधन, उर्वरक और विदेशी मुद्रा भंडार पर पश्चिम एशिया संकट का प्रभाव
हाल ही में पश्चिम एशिया संकट के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था पर उठ रहे सवालों के संदर्भ में “3F” - Fuel (ईंधन), Fertiliser (उर्वरक) और Foreign Exchange (विदेशी मुद्रा) से जुड़ी चिंताओं को रेखांकित किया गया है ।
विदेशी मुद्रा संरक्षण के संदर्भ में समझना आवश्यक है क्योंकि वर्तमान चुनौतियाँ मुख्यतः बाह्य कारकों से प्रेरित हैं और भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था इससे प्रभावित होती है
अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की ऊँची और अस्थिर कीमतें, उर्वरकों की कीमतों में अभूतपूर्व वृद्धि तथा सोने की बढ़ती कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था के बाहरी क्षेत्र पर दबाव उत्पन्न कर रही हैं।
प्रधानमंत्री ने विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए कोविड काल जैसी उपभोग आदतें अपनाने का आह्वान किया था।
इसमें वर्क फ्रॉम होम, वर्चुअल मीटिंग्स को बढ़ावा देना, गैर-जरूरी विदेशी यात्राओं से बचना, एक वर्ष तक सोने की खरीद को सीमित करना तथा स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देना शामिल था। चूँकि इन गतिविधियों में आयात एवं विदेशी मुद्रा व्यय शामिल होता है, इसलिए इन उपायों का उद्देश्य विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करना था।
इसके बाद सरकार ने रुपये में गिरावट रोकने और विदेशी मुद्रा संरक्षण के लिए कई कदम उठाए। इनमें सोना, चाँदी और प्लैटिनम पर आयात शुल्क में वृद्धि, निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं के अंतर्गत शुल्क-मुक्त सोने के आयात पर प्रतिबंध तथा पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में कई बार वृद्धि शामिल है।
विदेशी पूँजी निकासी और कमजोर निवेश प्रवाह के कारण भारतीय रुपया दबाव में बना हुआ है। पश्चिम एशिया संघर्ष शुरू होने के बाद विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय शेयरों और बॉन्ड से लगभग 24.4 अरब डॉलर की निकासी की। इसके परिणामस्वरूप रुपया फरवरी के अंत से लगभग 5 प्रतिशत कमजोर हुआ और प्रति डॉलर 97 रुपये के स्तर के करीब पहुँच गया।
रुपये में अत्यधिक गिरावट रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया।
हालाँकि इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ा और रिपोर्टों के अनुसार युद्ध-पूर्व स्तर की तुलना में विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 40 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई।
मार्च में RBI की सकल विदेशी मुद्रा बिक्री 29.6 अरब डॉलर रही, जो पिछले 13 महीनों में सबसे अधिक थी।
अर्थशास्त्रियों ने आशंका जताई है कि बढ़ती आयात लागत, रुपये में गिरावट तथा ऊर्जा झटकों के कारण बढ़ती मुद्रास्फीति के चलते भारत को 2026–27 में लगातार तीसरे वर्ष भुगतान संतुलन (Balance of Payments - BoP) घाटे का सामना करना पड़ सकता है।
यद्यपि RBI ने 2026–27 में GDP वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान व्यक्त किया है, लेकिन कई विशेषज्ञ इसे 6–6.5 प्रतिशत के बीच मान रहे हैं।
वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था को लेकर नकारात्मक आकलनों को खारिज करते हुए कहा कि ऐसे निराशावादी दृष्टिकोण अनावश्यक भय उत्पन्न करते हैं और जनविश्वास को कमजोर करते हैं। उन्होंने कहा कि भारत एक मजबूत अर्थव्यवस्था बना हुआ है और इस समय विश्वास निर्माण अत्यंत आवश्यक है।
पश्चिम एशिया संकट के बीच बढ़ते उर्वरक आयात बिल की चिंता
3F (ईंधन, उर्वरक और विदेशी मुद्रा) से जुड़ी चिंताओं तथा रुपये के अवमूल्यन के संयुक्त प्रभाव से भारत का उर्वरक आयात व्यय बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि 2026–27 में भारत का उर्वरक आयात बिल 2022–23 के 33.4 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर को पार कर सकता है।
भारत के उर्वरक क्षेत्र की स्थिति
भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता तथा तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। देश में कुल उर्वरक उत्पादन 2014–15 के 385.39 लाख मीट्रिक टन (LMT) से बढ़कर 2023–24 में 503.35 LMT हो गया है।
हालाँकि उत्पादन बढ़ने के बावजूद भारत की उर्वरक खपत अधिक बनी हुई है। वर्ष 2023–24 में कुल उर्वरक खपत लगभग 601 LMT रही, जिसमें से लगभग 177 LMT आयात के माध्यम से प्राप्त की गई।
भारत की उर्वरक सब्सिडी भी FY26 में बजट अनुमान 1.67 ट्रिलियन रुपये से अधिक होने की संभावना है, जिसका मुख्य कारण यूरिया और डीएपी (Di-Ammonium Phosphate) की अधिक खपत है।
उर्वरक क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियाँ
भारत उर्वरकों और उनके कच्चे माल के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर है क्योंकि देश में खनिज संसाधन सीमित हैं। LNG, रॉक फॉस्फेट, अमोनिया तथा पोटाश जैसे प्रमुख इनपुट बड़ी मात्रा में आयात किए जाते हैं। इससे उर्वरक क्षेत्र वैश्विक संघर्षों, मूल्य अस्थिरता और विदेशी मुद्रा दबावों के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
FY26 में उर्वरकों और संबंधित इनपुट का कुल आयात बिल लगभग 27.2 अरब डॉलर तक पहुँच गया।
एक अन्य चुनौती सब्सिडी बनाम उत्पादकता विरोधाभास है। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) ने चेतावनी दी है कि यदि उर्वरक सब्सिडी समाप्त की जाती है तो किसानों द्वारा उर्वरक उपयोग कम हो सकता है, जिससे कृषि उत्पादकता प्रभावित होगी।
इसके अतिरिक्त, सरकारी सब्सिडी भुगतान में देरी से निजी एवं सहकारी उर्वरक इकाइयों के लिए कार्यशील पूँजी संकट उत्पन्न होता है।
आगे की राह : CACP की सिफारिशें (खरीफ 2026–27)
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) ने अपनी खरीफ 2026–27 मूल्य नीति रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि AgriStack जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर संतुलित पोषक तत्व उपयोग को बढ़ावा दिया जाए ताकि उर्वरक सब्सिडी का बोझ कम किया जा सके।
आयोग ने यह भी सुझाव दिया कि भारत के पारंपरिक नाइट्रोजन : फॉस्फोरस : पोटाश (N:P:K) अनुपात 4:2:1की पुनर्समीक्षा की जानी चाहिए क्योंकि कृषि-जलवायु परिस्थितियाँ, फसल पैटर्न तथा सिंचाई प्रणालियाँ बदल रही हैं।
इसके अतिरिक्त, सूक्ष्म एवं द्वितीयक पोषक तत्वों के उपयोग को बढ़ावा देने तथा मृदा कार्बनिक कार्बन सुधार रणनीतियों को अपनाने की आवश्यकता बताई गई है।
निष्कर्ष
भारत की “3F” चुनौती - ईंधन, उर्वरक और विदेशी मुद्रा वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाओं के घरेलू अर्थव्यवस्था पर बढ़ते प्रभाव को दर्शाती है।
बढ़ती ईंधन लागत, उर्वरक आयात निर्भरता तथा विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव प्रमुख चिंताएँ बनकर उभरे हैं।
दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के लिए आयात निर्भरता कम करना, घरेलू उत्पादन बढ़ाना और संसाधनों का दक्ष प्रबंधन आवश्यक होगा।