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हिमाचल की घेपन झील बन रही है बड़ा खतरा? सिस्सू गांव पर मंडरा रहा ग्लेशियल बाढ़ का संकट

चर्चा में क्यों ?

  • हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में स्थित सिस्सू गांव इन दिनों एक गंभीर पर्यावरणीय खतरे को लेकर चर्चा में है।
  • गांव के ऊपर स्थित घेपन झील (Ghepan Lake) का आकार लगातार बढ़ रहा है, जिससे वैज्ञानिकों ने ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) अर्थात हिमनदी झील फटने से आने वाली बाढ़ की आशंका व्यक्त की है। 
  • यदि ऐसा होता है तो सिस्सू सहित आसपास के कई गांवों, कृषि भूमि और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हो सकता है।

अटल सुरंग के बाद पर्यटन का केंद्र बना सिस्सू

  • चंद्र नदी के किनारे स्थित सिस्सू गांव अटल सुरंग के उद्घाटन के बाद हिमाचल प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल हो गया है। 
  • अक्टूबर 2020 में अटल सुरंग के खुलने के बाद यहां पर्यटकों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। प्रतिदिन लगभग 2,000 वाहन सिस्सू पहुंचते हैं, जबकि पर्यटन सीजन में यह संख्या 5,000 तक पहुंच जाती है। 
  • नौकायन, जिपलाइनिंग, होमस्टे और एडवेंचर गतिविधियों ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी है। हालांकि, बढ़ते पर्यटन के बीच एक बड़ा प्राकृतिक खतरा भी सामने आ रहा है।

क्या है घेपन झील ?

  • घेपन झील, जिसे घेपांग घाट हिमनदी झील भी कहा जाता है, सिस्सू गांव से लगभग 11 किलोमीटर दूर और समुद्र तल से 4,068 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। 
  • यह झील घेपन ग्लेशियर के निकट स्थित है और लाहौल क्षेत्र के आराध्य देवता घेपन के नाम पर जानी जाती है। स्थानीय लोगों के लिए इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है।

वैज्ञानिकों को क्यों सता रही है चिंता ?

  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने घेपन झील को "अत्यधिक संवेदनशील" हिमनदी झील की श्रेणी में रखा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि झील का प्राकृतिक बांध टूटता है तो इससे उत्पन्न बाढ़ सिस्सू गांव के लिए अत्यंत विनाशकारी साबित हो सकती है। 
  • राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र (NRSC) की रिपोर्ट के अनुसार, झील फटने की स्थिति में सिस्सू सबसे पहले और सबसे अधिक प्रभावित होने वाला गांव होगा।

मात्र 21 मिनट में पहुंच सकती है बाढ़

  • वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार यदि झील का बांध टूट जाता है, तो बाढ़ का पानी केवल 21 मिनट में सिस्सू गांव तक पहुंच सकता है। इस दौरान पानी की गति लगभग 43 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकती है और इसकी गहराई 20 मीटर तक पहुंच सकती है। 
  • बाढ़ के साथ बड़े-बड़े पत्थर, चट्टानें और भारी मात्रा में मलबा भी बहकर आएगा, जिससे नुकसान और अधिक बढ़ सकता है।

तीन दशकों में तीन गुना बढ़ गया झील का आकार

  • राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1989 में घेपन झील का क्षेत्रफल 36.49 हेक्टेयर था, जो वर्ष 2022 तक बढ़कर 101.30 हेक्टेयर हो गया। 
  • इसका अर्थ है कि पिछले तीन दशकों में झील का आकार लगभग तीन गुना बढ़ चुका है। यह तेजी से हो रहे ग्लेशियर पिघलाव और जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।

तेजी से सिकुड़ रहा है घेपन ग्लेशियर

  • वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि घेपन ग्लेशियर लगातार पीछे हट रहा है। वर्ष 1962 से अब तक यह ग्लेशियर लगभग 2.76 किलोमीटर सिकुड़ चुका है। 
  • वर्ष 2015 से 2023 के बीच इसमें प्रति वर्ष लगभग 0.90 मीटर जल समतुल्य बर्फ की कमी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते तापमान और हिमपात की जगह वर्षा में वृद्धि इसके प्रमुख कारण हैं।

क्या होता है GLOF ?

  • ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) वह स्थिति होती है जब किसी हिमनदी झील का प्राकृतिक बांध अचानक टूट जाता है। यह बांध आमतौर पर चट्टानों, रेत और हिमनदों द्वारा जमा किए गए मलबे से बना होता है। 
  • भारी वर्षा, भूस्खलन, हिमस्खलन या ग्लेशियर के बड़े टुकड़ों के झील में गिरने से यह बांध टूट सकता है और अचानक विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।

संभावित नुकसान कितना बड़ा हो सकता है ?

  • विशेषज्ञों के अनुसार यदि घेपन झील फटती है तो लगभग 34 बस्तियां प्रभावित हो सकती हैं। इसके अलावा 204 हेक्टेयर कृषि भूमि, 57 पुल और 106 किलोमीटर सड़क को नुकसान पहुंच सकता है। 
  • मनाली-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग, अटल सुरंग और पर्यटन से जुड़ा बुनियादी ढांचा भी खतरे में पड़ सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका प्रभाव चिनाब नदी के माध्यम से जम्मू-कश्मीर तक महसूस किया जा सकता है।

चेतावनी प्रणाली अभी भी अपर्याप्त

  • हालांकि कई वैज्ञानिक संस्थान घेपन झील की निगरानी कर रहे हैं, लेकिन अभी तक वहां पूर्ण विकसित पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित नहीं की गई है। 
  • सायरन नेटवर्क, वास्तविक समय की चेतावनी प्रणाली और स्पष्ट निकासी मार्गों का अभाव बना हुआ है। वर्तमान में एक पायलट चेतावनी प्रणाली का परीक्षण किया जा रहा है, लेकिन इसे पूरी तरह लागू किया जाना बाकी है।

क्या पर्यटन और निर्माण गतिविधियां भी जिम्मेदार हैं ?

  • विशेषज्ञ सीधे तौर पर पर्यटन को जिम्मेदार नहीं ठहराते, लेकिन उनका मानना है कि बढ़ती मानवीय गतिविधियां पर्यावरणीय दबाव को बढ़ाती हैं। वाहनों से निकलने वाली धूल बर्फ की सतह पर जम जाती है, जिससे उसकी परावर्तक क्षमता कम हो जाती है और वह अधिक गर्मी अवशोषित करने लगती है। इसके परिणामस्वरूप ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।

हिमालय में बढ़ता जलवायु संकट

  • घेपन झील का मामला केवल हिमाचल प्रदेश तक सीमित नहीं है। हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में वर्ष 1990 से 2020 के बीच ग्लेशियरों का लगभग 12 प्रतिशत क्षेत्रफल कम हो चुका है। 
  • भारत में हिमनदी झीलों का कुल क्षेत्रफल भी तेजी से बढ़ रहा है। हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2016 में 805 हिमनदी झीलें थीं, जो वर्ष 2022 तक बढ़कर 1,619 हो गईं। यह स्थिति हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

स्थानीय लोगों के मन में बढ़ रही चिंता

  • सिस्सू और आसपास के गांवों के लोग इस खतरे से भलीभांति परिचित हैं। कई ग्रामीणों को चिंता है कि यदि भविष्य में कोई बड़ी आपदा आती है तो उनका पुनर्वास कैसे होगा और उनकी आजीविका का क्या होगा। 
  • वहीं कुछ स्थानीय लोग मानते हैं कि झील वर्षों से मौजूद है और तत्काल खतरे की संभावना कम है। इसके बावजूद हर भारी बारिश के दौरान लोगों की चिंता बढ़ जाती है।

निष्कर्ष

  • घेपन झील का लगातार बढ़ता आकार और तेजी से पिघलते ग्लेशियर हिमालय में जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों को उजागर करते हैं। यदि समय रहते प्रभावी चेतावनी प्रणाली, वैज्ञानिक निगरानी और आपदा प्रबंधन उपायों को मजबूत नहीं किया गया, तो यह झील भविष्य में एक बड़ी प्राकृतिक आपदा का कारण बन सकती है। 
  • सिस्सू और आसपास के क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों और स्थानीय समुदायों के बीच समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।
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