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भूल जाने का अधिकार (Right to be forgotten)

संदर्भ 

डिजिटल युग में इंटरनेट पर उपलब्ध व्यक्तिगत सूचनाएँ किसी व्यक्ति की पहचान एवं प्रतिष्ठा को दीर्घकाल तक प्रभावित कर सकती हैं, भले ही वह न्यायिक या प्रशासनिक प्रक्रिया में निर्दोष सिद्ध हो चुका हो। इसी संदर्भ में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भूल जाने के अधिकार (Right to be Forgotten) पर महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए डिजिटल निजता, मानवीय गरिमा तथा खुली न्याय व्यवस्था के मध्य संतुलन स्थापित करने हेतु व्यापक संवैधानिक सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं। 

भूल जाने का अधिकार (Right to be Forgotten) क्या है? 

  • भूल जाने का अधिकार वह अधिकार है, जिसके अंतर्गत किसी व्यक्ति को ऐसी व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक डिजिटल मंचों अथवा खोज परिणामों (Search Results) से हटाने या डी-इंडेक्स (De-index) कराने का अधिकार प्राप्त होता है, जिसकी निरंतर उपलब्धता उसकी गरिमा एवं निजता को क्षति पहुँचा रही हो तथा जिसका संरक्षण किसी व्यापक सार्वजनिक हित की पूर्ति नहीं करता हो।  
  • इस अवधारणा को वैश्विक स्तर पर पहचान वर्ष 2014 में मिली, जब स्पेन के नागरिक मारियो कोस्टेजा गोंज़ालेज़ ने यूरोपीय न्यायालय (European Court of Justice) में यह शिकायत की कि गूगल उनके मकान की नीलामी से संबंधित पुराने समाचार को खोज परिणामों में प्रदर्शित करता रहा, जबकि उनका ऋण वर्षों पूर्व चुका दिया गया था। 
  • न्यायालय ने उनके पक्ष में निर्णय देते हुए राइट टू इरेज़र (Right to Erasure) की अवधारणा को मान्यता प्रदान की, जिसे बाद में यूरोपीय संघ के सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन (GDPR) के अनुच्छेद 17 में विधिक रूप से समाहित किया गया। 

भारतीय विधिक व्यवस्था में भूल जाने के अधिकार का विकास 

  • भारतीय संदर्भ में इस अधिकार की संवैधानिक आधारशिला सर्वोच्च न्यायालय के के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) के ऐतिहासिक निर्णय में निहित है। न्यायालय ने इस निर्णय में अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता के अधिकार (Right to Privacy) को मौलिक अधिकार घोषित किया तथा यह स्पष्ट किया कि सूचनात्मक निजता (Informational Privacy) भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है। 
  • यद्यपि इस निर्णय के पश्चात विभिन्न उच्च न्यायालयों ने इस विषय पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण अपनाए। कुछ मामलों, विशेषकर वैवाहिक विवादों एवं सीमित आपराधिक मामलों में, न्यायालयों ने पक्षकारों की पहचान छिपाने (Masking/Anonymisation) की अनुमति प्रदान की, जबकि अन्य मामलों में खुली न्याय व्यवस्था (Open Justice) तथा जनता के जानने के अधिकार (Right to Know) को प्राथमिकता देते हुए ऐसे अनुरोध अस्वीकार कर दिए गए। 
  • फलस्वरूप, निजता एवं पारदर्शिता के मध्य संतुलन स्थापित करने हेतु एक स्पष्ट न्यायिक मानक (Judicial Framework) का अभाव बना रहा, जिसे दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने नवीन निर्णय के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया है। 

दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय : प्रमुख बिंदु  

  • 29 मई 2026 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने लक्ष वीर सिंह यादव बनाम भारत संघ सहित 30 से अधिक याचिकाओं का संयुक्त रूप से निस्तारण करते हुए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी किए।
  • न्यायालय के समक्ष मूल प्रश्न यह था कि क्या सूचनात्मक निजता के अधिकार के आधार पर न्यायिक अभिलेखों को खोज परिणामों से हटाया जा सकता है अथवा उनमें पक्षकारों की पहचान गोपनीय रखी जा सकती है, जबकि भारतीय न्याय व्यवस्था खुली न्याय प्रणाली के सिद्धांत पर आधारित है। 
  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि भूल जाने का अधिकार, अनुच्छेद 21 द्वारा संरक्षित मानवीय गरिमा (Human Dignity) तथा सूचनात्मक निजता का स्वाभाविक विस्तार है। 
  • इसके साथ ही न्यायालय ने संरचित आनुपातिकता परीक्षण (Structured Proportionality Test) को अपनाते हुए निम्नलिखित सिद्धांत प्रतिपादित किए—
    • सूचना के संरक्षण का उद्देश्य वैध एवं न्यायसंगत होना चाहिए।
    • व्यक्ति की निजता को होने वाली क्षति एवं व्यापक सार्वजनिक हित के मध्य संतुलन स्थापित किया जाना चाहिए।
    • जहाँ संभव हो, न्यूनतम हस्तक्षेप (Least Restrictive Measure) का सिद्धांत अपनाया जाए; अर्थात् संपूर्ण निर्णय हटाने के बजाय केवल पक्षकारों के नाम अथवा पहचान संबंधी विवरणों को गोपनीय बनाया जाए।
    • न्यायालय ने कानूनी डेटाबेस को दो सप्ताह के भीतर आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश देते हुए स्पष्ट किया कि केवल पक्षकारों की पहचान हटाई जाएगी, जबकि न्यायिक निर्णय का तथ्यात्मक एवं विधिक भाग सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रहेगा।

संवैधानिक मूल्यों के साथ अंतर्संबंध 

  • भूल जाने का अधिकार कोई निरपेक्ष (Absolute) अधिकार नहीं है। इसका प्रत्यक्ष संबंध तथा अनेक बार टकराव निम्नलिखित संवैधानिक सिद्धांतों से होता है-
    • अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत अभिव्यक्ति एवं प्रेस की स्वतंत्रता।
    • खुली न्याय व्यवस्था (Open Justice) का सिद्धांत।
    • जनता का जानने का अधिकार (Right to Know)। 
  • अतः प्रत्येक मामले में यह परीक्षण आवश्यक होगा कि निजता की रक्षा की आवश्यकता अधिक महत्वपूर्ण है अथवा सूचना की सार्वजनिक उपलब्धता। विशेष रूप से गंभीर अपराधों अथवा व्यापक सार्वजनिक महत्व के मामलों में सार्वजनिक हित को प्राथमिकता दी जा सकती है। किन्तु किसी व्यक्ति को केवल उसके डिजिटल अतीत के कारण अनिश्चितकाल तक सामाजिक दंड भुगतने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। 
  • न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक निर्णय सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रहेंगे तथा उन्हें वाद संख्या अथवा अन्य की-वर्ड के माध्यम से खोजा जा सकेगा। केवल नाम-आधारित खोज (Name-Based Search) को सीमित किया जाएगा। 

व्यावहारिक चुनौतियाँ

इस अधिकार की सबसे बड़ी चुनौती इसके प्रभावी क्रियान्वयन (Enforcement) से जुड़ी हुई है।

  • यद्यपि न्यायालय किसी सूचना को खोज परिणामों से हटाने का निर्देश दे सकता है, तथापि इंटरनेट पर उपलब्ध मिरर वेबसाइटों, डिजिटल अभिलेखागार (Archives) अथवा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर वही सामग्री उपलब्ध बनी रह सकती है। 
  • इसके अतिरिक्त, सर्च इंजन की संरचना के कारण किसी व्यक्ति के विरुद्ध लगे पुराने आरोप प्रायः उसके नाम के साथ सबसे पहले प्रदर्शित होते हैं, जिससे उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 
  • अतः विभिन्न डिजिटल मंचों, सर्च इंजनों एवं नियामक संस्थाओं के मध्य प्रभावी तकनीकी समन्वय के अभाव में यह अधिकार व्यावहारिक रूप से सीमित रह सकता है।  

डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (DPDP Act) के साथ संबंध 

  • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 की धारा 12 सीमित रूप से डेटा मिटाने (Erasure) का अधिकार प्रदान करती है। तथापि यह व्यवस्था मुख्यतः सहमति-आधारित (Consent-Based) है तथा न्यायिक अभिलेखों एवं सार्वजनिक अभिलेखागार से संबंधित मामलों पर स्पष्ट रूप से लागू नहीं होती। 
  • इसके अतिरिक्त, अधिनियम के अंतर्गत आवश्यक नियम अभी अधिसूचित नहीं किए गए हैं तथा डेटा संरक्षण बोर्ड भी पूर्ण रूप से कार्यशील नहीं है। परिणामस्वरूप, वर्तमान समय में यह अधिनियम भूल जाने के अधिकार को प्रभावी रूप से लागू करने में सक्षम नहीं माना जा सकता। 

निर्णय लेने का उपयुक्त संस्थागत तंत्र 

  • डेटा हटाने अथवा डी-इंडेक्सिंग से संबंधित मामलों में दक्षता एवं उत्तरदायित्व के मध्य संतुलन स्थापित करना आवश्यक है। 
  • यदि प्रत्येक आवेदन का निर्णय केवल न्यायालय करेगा, तो न्यायिक प्रणाली पर अत्यधिक भार पड़ेगा। वहीं यदि यह अधिकार पूर्णतः डिजिटल कंपनियों को सौंप दिया जाए, तो निष्पक्षता, पारदर्शिता एवं विधिसम्मत प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न लग सकते हैं। इसलिए अधिक उपयुक्त व्यवस्था एक बहु-स्तरीय संस्थागत तंत्र (Tiered Institutional Framework) होगी, जिसमें-
    • सामान्य अनुरोधों का निस्तारण संबंधित डिजिटल प्लेटफॉर्म करें।
    • विवादित मामलों का निर्णय डेटा संरक्षण बोर्ड द्वारा किया जाए।
    • न्यायिक अभिलेखों से संबंधित मामलों का अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा किया जाए।  

निष्कर्ष 

  • दिल्ली उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय डिजिटल न्यायशास्त्र (Digital Jurisprudence) के विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि डिजिटल युग में व्यक्ति की गरिमा और निजता का संरक्षण उतना ही महत्वपूर्ण है जितना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायिक पारदर्शिता का संरक्षण।  
  • हालाँकि, इस अधिकार की वास्तविक प्रभावशीलता तभी सुनिश्चित होगी जब सर्वोच्च न्यायालय इस विषय पर अंतिम संवैधानिक मानक निर्धारित करेगा, डेटा संरक्षण बोर्ड पूर्ण रूप से कार्यशील होगा तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म न्यायिक निर्देशों का समयबद्ध एवं प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित करेंगे।  
  • अतः भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती ऐसी संस्थागत एवं तकनीकी व्यवस्था विकसित करना है, जो निजता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, खुली न्याय व्यवस्था तथा जनता के जानने के अधिकार आदि  सभी संवैधानिक मूल्यों के मध्य संतुलित एवं न्यायसंगत सामंजस्य स्थापित कर सके। 
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