New
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 8th June 2026, 6:30 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 1st June 2026, 5:30 PM English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 7th June 2026, 8:00 AM Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 8th June 2026, 6:30 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 1st June 2026, 5:30 PM English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 7th June 2026, 8:00 AM

सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं का प्रतिनिधित्व: क्या अब टूटेगी न्यायपालिका की अंतिम कांच की दीवार?

चर्चा में क्यों ?

  • हाल ही में न्यायमूर्ति वी. मोहना की भारत के सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आई है। वे बार (Bar) से सीधे सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त होने वाली केवल दूसरी महिला अधिवक्ता हैं। इससे पहले वर्ष 2018 में न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा को यह अवसर प्राप्त हुआ था। 
  • हालांकि यह उपलब्धि महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का संकेत देती है, लेकिन भारतीय उच्च न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अब भी अत्यंत सीमित है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह नियुक्ति वास्तव में न्यायपालिका की "अंतिम कांच की दीवार" (Last Glass Ceiling) को तोड़ने की दिशा में निर्णायक कदम साबित होगी ?

उच्च न्यायपालिका में महिलाओं की सीमित भागीदारी

  • भारतीय न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी ऐतिहासिक रूप से कम रही है। सर्वोच्च न्यायालय में बार से सीधे नियुक्त किए गए नौ पुरुष न्यायाधीशों में से कई ने लंबे समय तक सेवा की और कुछ, जैसे न्यायमूर्ति एस.एम. सीकरी तथा न्यायमूर्ति यू.यू. ललित, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) भी बने।
  • वर्तमान में कार्यरत न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन के भी भविष्य में मुख्य न्यायाधीश बनने की संभावना है। इसके विपरीत, पहली महिला प्रत्यक्ष नियुक्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा का कार्यकाल तीन वर्ष से भी कम रहा और वे कभी कॉलेजियम का हिस्सा नहीं बन सकीं। 
  • यह स्थिति दर्शाती है कि महिलाओं को न्यायपालिका में नेतृत्वकारी भूमिकाओं तक पहुँचने के अवसर अपेक्षाकृत कम मिले हैं।

वैश्विक अनुभव और सर्वोत्तम प्रथाएँ

  • दुनिया के कई देशों ने अपनी सर्वोच्च अदालतों में लैंगिक संतुलन सुनिश्चित करने के लिए विशेष संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधान अपनाए हैं।

बेल्जियम का मॉडल

  • वर्ष 2014 में बेल्जियम ने अपने संवैधानिक न्यायालय से संबंधित कानून में संशोधन करते हुए यह अनिवार्य किया कि न्यायालय में प्रत्येक लिंग का कम-से-कम एक-तिहाई प्रतिनिधित्व हो। 
  • जब तक यह लक्ष्य प्राप्त नहीं होता, तब तक प्रत्येक दो पुरुष नियुक्तियों के बाद तीसरी नियुक्ति महिला की होगी।

दक्षिण अफ्रीका का अनुभव

  • दक्षिण अफ्रीका के संविधान का अनुच्छेद 174(2) न्यायपालिका को देश की नस्लीय और लैंगिक संरचना का प्रतिबिंब बनाने की अपेक्षा करता है। 
  • वर्तमान में वहाँ के संवैधानिक न्यायालय में 11 में से 6 न्यायाधीश महिलाएँ हैं तथा न्यायालय का नेतृत्व भी एक महिला मुख्य न्यायाधीश कर रही हैं। 
  • यह दुनिया की पहली महिला-बहुल संवैधानिक अदालतों में से एक है।

क्या प्रतिनिधित्व आधारित नियुक्तियाँ नई अवधारणा हैं?

  • भारतीय न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व का सिद्धांत कोई नया विचार नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्तियों के दौरान विभिन्न उच्च न्यायालयों और क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देने की परंपरा पहले से मौजूद है। हाल के वर्षों में न्यायिक नियुक्तियों में भौगोलिक विविधता को भी महत्व दिया गया है।
  • ऐसी स्थिति में यदि क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को वैध मानदंड माना जाता है, तो लैंगिक प्रतिनिधित्व को भी संस्थागत मान्यता देना तर्कसंगत प्रतीत होता है।

भारत की स्थिति: वैश्विक मानकों से काफी पीछे

  • न्यायमूर्ति वी. मोहना की नियुक्ति के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय में महिलाओं की संख्या बेहद कम है।

वर्तमान स्थिति

  • सर्वोच्च न्यायालय की कुल स्वीकृत शक्ति : 37 न्यायाधीश
  • महिला न्यायाधीश : 2
  • कुल प्रतिनिधित्व : लगभग 5.4 प्रतिशत

अंतरराष्ट्रीय तुलना

देश

महिला न्यायाधीशों का प्रतिशत

दक्षिण अफ्रीका

54.5%

कनाडा

50%

बेल्जियम

50%

जर्मनी

50%

अमेरिका

44.4%

ऑस्ट्रेलिया

42.85%

फ्रांस

33.33%

सिंगापुर

लगभग 24%

नेपाल

लगभग 17%

यूनाइटेड किंगडम

लगभग 17%

भारत

5.4%

  • यह आँकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत विकसित और विकासशील दोनों प्रकार के लोकतंत्रों की तुलना में काफी पीछे है।

आवश्यक सुधार

1. संवैधानिक संशोधन

  • अनुच्छेद 124 (सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति) तथा अनुच्छेद 217 (उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति) में संशोधन कर यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि न्यायपालिका में महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यकों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो।

2. न्यायिक नीति का निर्माण

  • संवैधानिक संशोधन होने तक सर्वोच्च न्यायालय स्वयं एक लिखित नीति अपनाकर कम-से-कम 33.3 प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व का लक्ष्य निर्धारित कर सकता है।

3. लक्षित नियुक्ति प्रणाली

  • भारत बेल्जियम की तर्ज पर ऐसी व्यवस्था अपना सकता है जिसमें प्रत्येक दो पुरुष नियुक्तियों के बाद एक महिला न्यायाधीश की नियुक्ति अनिवार्य हो। यह प्रक्रिया तब तक जारी रखी जा सकती है जब तक न्यायपालिका में एक-तिहाई महिला प्रतिनिधित्व प्राप्त न हो जाए।

निष्कर्ष

न्यायमूर्ति वी. मोहना की नियुक्ति भारतीय न्यायपालिका में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है, लेकिन कुछ व्यक्तिगत नियुक्तियाँ संरचनात्मक असमानताओं को समाप्त नहीं कर सकतीं। सर्वोच्च न्यायालय में महिलाओं की मात्र 5.4 प्रतिशत उपस्थिति यह दर्शाती है कि लैंगिक समानता की दिशा में अभी लंबा सफर तय करना बाकी है।

« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR